अन्नकुट गोवर्धन पूजा

क्या है गोवर्धन पूजाः-

गोवर्धन पूजा दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला एक पर्व है, इस पर्व/त्यौहार का भारतीय जीवन मे अत्यधिक महत्व है, ये त्यौहार प्रकृति के साथ मानव सम्बन्ध को दर्शाता है। गोवर्धन पूजा में गायों की पूजा जाती है।, गाय की तुलना माँ लक्ष्मी के स्वरुप से की गई है, जिस प्रकार माँ लक्ष्मी सुख-समृद्धि देती है, उसी प्रकार गाय भी अपने दूध से स्वास्थ्य रुपी धन प्रदान करती है, गौ माता सभी मानव जाति के लिए पूजनीय और आदरणीय है, गौ माता के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोवर्धन की पूजा की जाती है।, जब कृष्ण भगवान ने ब्रजवासियों को मूसलाधार बारिश् से बचाने के लिए सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर रखा था, जिसकी छाया में ब्रजवासी सुखपूर्वक रहें, सातवें दिन जब भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा तब प्रत्येक वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकुट उत्सव मनाने की बात रखी, तभी से यह पर्व अन्नकुट के नाम से मनाया जाने लगा।

क्यों मनाया जाता है गोवर्धन पूजाः-

गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है, यह कथा देवराज इन्द्र का है कि उनको बहुत अभिमान हो गया था, उनके (इन्द्र) अभिमान को तोड़ने के लिए कृष्ण जी ने एक लीला रची, प्रभु श्री कृष्ण के लीला में एक दिन कन्हैया ने देखा की सभी बृजवासी पकवान बना रहे है और किसी पूजा की तैयारी कर रहे है, बाल गोपाल ने अनजान बनते हुए माँ यशोदा से पूछा मईया ये लोग किसकी पूजा की तैयारी कर रहे है, भगवान की बातें सुनकर माँ यशोदा ने बोला कि सभी देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकुट की तैयारी कर रहे है, माँ यशोदा की बात सुनकर कृष्ण जी ने उनसे पूछा कि इन्द्र की पूजा क्यो की जाती है इस पर उनके माँ ने जवाब दिया कि वह (इन्द्र) वर्षा करते है, जिससे अन्न (फसल) की पैदावार होती है और उसी से हमे अन्न तथा हमारी गायों को भी चारा मिलता है, तब भगवान कृष्ण अपने यशोदा मैया से बोले कि हम सभी को तो गोवर्धन पर्वत पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये तो चरने के लिए वहीं जाती है और इन्द्र तो कभी दर्शन नही देते और पूजा नही करने पर वह क्रोधित भी होते है इसलिए ऐसे अहंकारी का पूजा नहीं करना चाहिए। कृष्ण की इच्छा से सभी ने इन्द्र के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा की देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझकर भारी वर्षा की शुरुआत कर दी तब सभी ब्रजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि इन्ही की बात मानने के कारण ऐसा परिणाम हुआ है, तब श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन को उठा लिया और सभी बृजवासियों समेत उनके गाय-बछड़े को भी गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण दिया, ये सब देखने के बाद इन्द्र अत्यधिक क्रोधित हो गए और उनकी वर्षा का वेग और तीव्र हो गया, तब श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र को आज्ञा दी कि आप (सुदर्शन चक्र) पर्वत के उपर रहकर वर्षा की गति को नियंत्रित करे और शेषनाग को आज्ञा दिया कि आप भेड़ बनकर वर्षा के पानी को पर्वत की तरफ आने से रोंके।
सात दिन मूसलाधार वर्षा करने के पश्चात् इन्द्र को अहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई साधारण व्यक्ति नही हो सकता है और अन्त में वो ब्रह्म जी के पास गए आर सारीं बाते सुनायी तब ब्रह्म जी ने उन्हें बताया कि श्री कृष्ण स्वयं भगवान हरि (विष्णु) के अंश है, ब्रह्म जी की ये बात सुनने के पश्चात् इन्द्र लज्जित हो गए और श्री कृष्ण से क्षमा-याचना करने लगे की प्रभु मै आपको पहचान न सका और अहंकार के कारण मै भूल कर बैठा भगवान आप तो दयालु है कृपा मुझे माफ करें तत्पश्चात् देवराज इन्द्र ने श्री कृष्ण की पूजा कर उनको भोग लगाया, इस घटना के बाद से ही गोवर्धन पूजा मनायी जाने लगी, बृज के लोग इस त्यौहार को बहुत खुशी से मनाते है, गोवर्धन पर्वत की पूजा करते है, इस दिन गायों और बैलों को स्नान कर उन्हें लाल रंग का टीका लगाया जाता है और उनके गले मे रस्सी डाली जाती है तथा इस दिन गाय और बैलों को गुड़ और चावल भी मिलाकर खिलाया जाता है।
कैसे मनाई जाती है गोवर्धन पूजाः– गोवर्धन पूजा के दिन प्रातः काल शरीर पर तेल का मालिश किया जाता है और तत्पश्चात् स्नान किया जाता है, इस दिन लोग प्रातः अपने कुल देवी का ध्यान करते है और पूजा के लिए पुरी श्रद्धा से गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत भी बनाते है, इसे लेटे हुए पुरुष की आकृति में बनाया जाता है और फिर उस फूल, पत्ती, टहनियों आदि से सजाया जाता है, गोवर्धन के आकृति के मध्य में भगवान कृष्ण का मूर्ति रखा जाता है और नाभि के स्थान पर गड्ढ़ा बनाकर एक कटोरी या दीपक रखा जाता है तत्पश्चात् उसमे दूध, दही, गंगाजल, शहद और बतासे आदि डालकर पूजा की जाती है बाद में इन सामग्रीयों को प्रसाद के रुप में बाँट दिया जाता है।
गोवर्धन पूजा का महत्वः– गोवर्धन पूजा का भारतीय जीवन में अत्यधिक महत्व है, गोवर्धन पूजा के दिन गायों की पूजा की जाती है, पौराणिक कथाओं के अनुसार यह पता चलता है कि भगवान श्री कृष्ण ने ब्रजवासियों को इन्द्र के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए बोला था ऐसा इसलिए क्योंकि गोवर्धन पर्वत से ही गायों और बछड़ो को चारा मिलता था, गोवर्धन पूजा के दिन गायों को गुड़ और चावल खिलाने का रिवाज है, हमारे शास्त्रों में भी इस बात का जिक्र है कि गाय नदी के समान पवित्र होती है और गाय को माँ लक्ष्मी का स्वरुप भी माना गया है जिस प्रकार माँ लक्ष्मी सुख और समृद्धि प्रदान करती है उसी तरह गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रुपी धन प्रदान करती है, इस प्रकार हमारे जीवन में गोवर्धन पूजा का अत्यधिक महत्व है।
गोवर्धन पूजा, पूजा विधिः-
☸ सर्वप्रथम घर के आंगन या द्वार पर गोबर से गोवर्धन का चित्र बनाएं।
☸ तत्पश्चात् रोली, चावल, खीर, बताशे, जल, दूध, पान, केसर, फूल आदि से गोवर्धन भगवान की पूजा करें और उनको दीपक भी जलाएं।
☸ गोवर्धन पूजा के दिन श्रीकृष्ण का भी ध्यान करें।
☸ गोवर्धन पूजा के दिन भगवान श्रीकृष्ण को 56 या 108 भोग लगाने की परम्परा/रिवाज भी है।
☸ अन्त में श्रीकृष्ण जी की आरती करें और भोग लगाएं हुए प्रसाद को सभी में वितरित कर दें।
गोवर्धन पूजा तिथि एवं शुभ मुहूर्त 2022
तिथिः– 26 अक्टूबर 2022
पूजा मुहूर्तः– प्रातः 06ः29 से प्रातः 08ः43 तक
पूजा की कुल अवधिः- 02 घण्टे 14 मिनट

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