आखिर क्यों डरते हैं हनुमान जी से शनिदेव

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार हमारे ब्रह्माण्ड में स्थित शनि ग्रह यानि शनि देव को न्याय के देवता के रूप में जाना जाता है। किसी जातक की जन्मकुण्डली में स्थित शनिदेव वैसे तो जातक को उसके कर्म के अनुसार फल देते हैं परन्तु कुण्डली में यदि शनिदेव की बुरी दृष्टि पड़ गई है तो ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति का पतन भी शनिदेव के बुरे प्रभाव से निश्चित माना जाता है इसलिए शनिदेव का नाम सुनते ही हर किसी के मन में भय उत्पन्न हो जाता है ऐसे में हर कोई जाने अनजाने में किये गये बुरे कर्मों से मुक्ति पाने के लिए तरह-तरह के उपायों और प्रयासों में लगा रहता है परन्तु इन सब में क्या आपको पता है जो जातक बजरंग बली की सच्चे मन से पूजा-अर्चना करते हैं शनिदेव उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाते हैं।

बहुत से योग्य ज्योतिषीयों द्वारा ऐसा भी कहा जाता है कि हनुमान जी की पूजा करने से शनि देव के कुप्रभाव बहुत जल्द ही खत्म हो जाते हैं और कुछ समय बाद शनिदेव जातक को अच्छा फल देने लगते हैं। ऐसा क्यों होता हैं इन सब के बारे में विस्तार से हमारे योग्य ज्योतिषाचार्य के. एम. सिन्हा जी से समझते हैं।

हनुमान जी और शनिदेव की पौराणिक कथा

हनुमान जी और शनिदेव की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक घने वन में हनुमान जी प्रभु श्री राम जी का स्मरण करते हुए भक्ति में डूबे थें,उसी समय शनिदेव वहाँ से गुजर रहे थें, शनिदेव को किसी का भी अहित करने की शक्तियाँ प्राप्त थीं, अतः शनिदेव अपने इसी अहंकार में आकर अपनी वक्री दृष्टि से हनुमान जी को पूरी तरह से ढकने की कोशिश की और हनुमान जी के पास जाकर उन्हें युद्ध करने के लिए ललकारने लगें, परन्तु हनुमान जी प्रभु श्री राम के ध्यान और भक्ति में डूबे होने के कारण शनिदेव की एक बात न सुनि, शनिदेव ने हनुमान जी को एक बार फिर युद्ध के लिए ललकारने का प्रयास किया परन्तु इस बार भी उन्हें असफलता ही हाथ लगी।

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आखिरी बार शनिदेव ने फिर हनुमान जी को डराने का प्रयास किया परन्तु हनुमान जी नही डरे, कुछ देर बाद आँखे खोलते हुए बड़े ही विनम्रता के साथ हनुमान जी ने शनिदेव से कहा आप कौन हैं यह सुनते ही शनिदेव और ज्यादा क्रोधित हो गये और क्रोध में आकर बोले मैं तीनों लोकों को भयभीत करने वाला शनि हूँ आज मैं तेरी ही राशि में प्रवेश करके तुझे भयभीत करने वाला हूँ, तु मुझे यदि रोक सकता है तो रोक ले, यह सुनकर हनुमान जी ने विनम्र भाव से कहा कि हे शनिदेव! आप अपना क्रोध कहीं और दिखायें मुझे मेरे प्रिय प्रभु श्री राम का ध्यान शांति से करने दें, इतना कहकर हनुमान जी फिर से ध्यान मग्न हो गये।

उसी समय शनिदेव ने क्रोधित होकर हनुमान जी की बांह पकड़ ली परन्तु हनुमान जी ने अपनी बांह झटके से छुड़ा लिया, यह देख शनिदेव ने विकराल रूप धारण करके हनुमान जी की दूसरी बाँह पकड़ने के लिए आगे बढ़ें, तभी हनुमान जी ने क्रोध में आकर अपनी पूंछ में शनिदेव को लपेट लिया। तब शनिदेव ने कहा कि हे वानर ! तुम तो क्या तुम्हारे राम भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते हैं यह सुनते ही हनुमान जी अत्यधिक क्रोधित होकर पहाड़ों के वृक्ष पर उन्हें खूब पटका जिससे शनिदेव का बहुत बुरा हाल हुआ।

शनिदेव ने अपनी जान बचाने के लिए सृष्टि पर स्थित सभी देवी-देवताओं को लिए बुलाने का प्रयास किया परन्तु कोई भी उनकी मदद के लिए नहीं आया। अंत में शनिदेव ने हनुमान जी से क्षमा माँगते हुए कहा कि मुझे अपने द्वारा किये जाने वाले बुरे बर्ताव का फल मिल चुका है कृपया मुझे क्षमा करें अब मैं भविष्य में आपकी छाया से भी दूर रहूँगा तभी हनुमान जी ने कहा कि आप मेरी और मेरे सभी भक्तों की छाया से भी दूर रहेंगे। शनि देव ने तथास्तु कहकर हनुमान जी को यह वरदान दिया तभी से यह परम्परा लागू हो गई, इसलिए शनिदेव को शांत करने के लिए हनुमान जी की श्रद्धा से पूजा अर्चना करने की सलाह दी जाती है।

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बंद कारागार से दिलाई थी शनिदेव को मुक्ति

एक और पौराणिक कथाओं के अनुसार जब माता सीता को खोजते हुए हनुमान जी लंका पहुंचे तभी वहाँ उन्होंने एक बंद कारागार में शनिदेव को देखा और देखते ही हनुमान जी ने उनके उल्टा लटके होने का कारण जाना, तभी शनिदेव ने बताया कि दुष्ट रावण ने अपने योग बल से उनके साथ-साथ कई अन्य ग्रहों को भी इसी तरह से कैद कर रखा है। यह सुनते ही हनुमान जी ने शनिदेव को रावण की कैद से आजाद कराया। आजाद होने के बाद शनिदेव ने प्रसन्न होकर हनुमान जी से स्वयं वर मांगने को कहा तब हनुमान जी ने शनिदेव से यह वचन मांगा कि उनकी आराधना करने वाले भक्तों को आप कभी भी कष्ट नही पहुँचायेंगे, शनिदेव ने हनुमान जी का कहा मान लिया। अतः इन सभी कथाओं को सुनने के बाद ही शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि दोष के निवारण के लिए हनुमान जी की पूजा अर्चना करने की सलाह दी जाती है।