इस सप्ताह के अंत में शनि को 2023 के सबसे बड़े और सबसे चमकीले ग्रह के रूप में देखें

अगस्त माह में हाने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटना

27 अगस्त दिन रविवार को हम शनि ग्रह और उसके रिंग को दूरदर्शी के माध्यम से देख सकते हैं क्योंकि इस दिन शनि सूर्य के ठीक विपरीत होगा और पृथ्वी के नजदीक होगा। ये बेहद दुर्लभ खगोलीय घटना है। जो कई वर्षों के पश्चात देखने को मिल रही है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में भी शनि को विशेष महत्व दिया गया। किसी भी व्यक्ति के जीवन में शनि की विशेष भूमिका है।

शनि का खगोलीय स्वरूप

इस सप्ताह के अंत में शनि को 2023 के सबसे बड़े और सबसे चमकीले ग्रह के रूप में देखें 30

शनि ग्रह को आकार में दूसरे बड़े ग्रह के रूप में जाना जाता है। इस ग्रह का रंग नीला होता है सूर्य ग्रह से इसकी दूरी 1,42,60,00,00 किमी है, यह सूर्य की एक परिक्रमा 29 वर्षों में पूर्ण करता है क्योंकि शनि शनैःचर अर्थात मन्द गति से चलने वाला ग्रह है। इसका व्यास 1,20,500 किमी है। इस ग्रह का गुरूत्व बल, पृथ्वी के गुरूत्व बल से 65 गुणा अधिक है। नौ चन्द्रमा शनि की परिक्रमा करते हैं उनमें से छठा चन्द्र, मन्दी सबसे बड़ा होता है। जब कभी शनि अस्त हो जाता है तो वह तीन दिनों के बाद ही उदय होता है तथा उदय के 135 दिन मार्गी होता है और उसके पश्चात 105 दिन बाद पश्चिम में पुनः अस्त हो जाता है। शनि को कई नामों से जाना जाता है जैसे- काण, अर्कपुत्र, छायात्मक, असित, नील, मन्द, खेज आदि।

शनि की गति

इस सप्ताह के अंत में शनि को 2023 के सबसे बड़े और सबसे चमकीले ग्रह के रूप में देखें 31

शनि ग्रह सूर्य की परिक्रमा 29 वर्ष 5 महीने 16 दिन 23 घण्टों और 16 मिनट में पूर्ण करता हैं। यह अपनी धूरी पर 17 घण्टा 14 मिनट 24 सेकेण्ड में एक परिक्रमा पूरी करता है। स्थूल मान से शनि ग्रह एक राशि पर 30 महीना, एक नक्षत्र पर 400 दिन और एक नक्षत्र चरण पर 100 दिन रहता है तथा यह प्रत्येक 04 महीने वक्री और आठ महीने मार्गी रहता है। जब शनि सूर्य से 15 डिग्री पर होता है तो वह अस्त हो जाता है। अस्त होने के पश्चात यह 38 दिनों में उदित होता है। उदय के 135 दिन पश्चात मार्गी हो जाता है। यह प्रायः 140 दिन तक भी वक्री रह जाता है तथा वक्री होने के 5 दिन आगे या पीछे तक यह स्थिर अवस्था में रहता है।

READ ALSO   7 अगस्त कर्क राशि में शुक्र का राशि परिवर्तन

गणितीय माध्यम द्वारा यह स्पष्ट होता है कि जब शनि सूर्य से चौथी राशि को समाप्त करता है तो वक्री अवस्था में आ जाता है और जब वक्री से 120 डिग्री चलता है तो मार्गी हो जाता है। जब इसकी गति 7/45 की होती है तब यह अतिचारी हो जाता है। सूर्य से दूसरी और बाहरवीं राशि पर शीघ्र गामी, तीसरी और ग्यारहवीं राशि पर समान गति से, चौथी पर मन्द गति से, पाचवीं और छठी पर वक्री, सातवीं एवं आठवीं पर अति वक्री तथा नवमी और दसवीं पर कुटिल गति वाला हो जाता है।