उत्तराखण्ड में स्थित गौरी कुण्ड की सम्पूर्ण जानकारी

उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित गौरी कुण्ड मंदाकिनी नदी के पवित्र तट पर स्थित एक प्रमुख तीर्थ स्थल है जिसे आध्यात्मिकता और मोक्ष प्राप्ति का प्रवेश द्वार माना जाता है। वास्तव में इस कुंड का संबंध भगवान शिव की पत्नी माता पार्वती से है जिन्हें माँ गौरी के नाम से भी जाना जाता है। गौरीकुण्ड की धार्मिक मान्यताओं को देखते हुए ही सभी भक्त यहाँ दर्शन करने के लिए आते हैं और वे इस कुंड में स्नान करके ही आगे बढ़ते है आइए इस कुण्ड से जुड़ी और क्या मान्यताएं और कथाएं हैं साथ ही यहाँ के दर्शन कर पाना कब संभव है इन सब के बारे में विस्तार से जानते हैं।

गौरी कुण्ड से जुड़ा इतिहास

मान्यताओं के अनुसार आदि शंकराचार्य जी ने गौरीकुण्ड मंदिर की स्थापना की थी और इस मंदिर को प्राचीन मंदिर का दर्जा भी दिलवाया था। कहा जाता है कि यह गौरी कुण्ड मंदिर माँ पार्वती की कृपा प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण स्थल है और वर्तमान में यह मंदिर माँ पार्वती के पूजा स्थलों में से एक सबसे महत्वपूर्ण स्थल बन चुका है। इसी कारणवश यहाँ पर आज भी बहुत से श्रद्धालुओं की भीड़ जमा रहती है।

गौरी कुण्ड मंदिर से जुड़ी कथाएं
गौरी कुण्ड मंदिर की माँ पार्वती से जुड़ी कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार पिता राजा दक्ष के द्वारा शिव जी का बुरी तरह से अपमान किये जाने के कारण माता सती ने वहाँ स्थित यज्ञकुण्ड की अग्नि में आत्मदाह कर लिया था, उस समय भगवान शिव जी से अत्यधिक क्रोधित होकर राजा दक्ष का वध कर दिया और स्वयं लंबी साधना में चले गये इस घटना को कुछ वर्ष बीत जाने के बाद माता सती का हिमालय की पुत्री के रुप में पुर्नजन्म हुआ जिनका नाम पार्वती रखा गया।

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उसके बाद माँ पार्वती ने भगवान शिव जी को पति के रुप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी कहाँ जाता है कि माँ पार्वती से गौरी कुण्ड में बैठकर लगभग 3 हजार वर्षों तक घोर तपस्या की थीं। माँ पार्वती के कठोर तपस्या के बाद भी जब शिव जी नही आए तब उन्होंने भोजन त्यागकर बेलपत्र और जल के सहारे एक हजार वर्षों तक पुनः तपस्या की थी, तब जाकर भोलेनाथ प्रकट हुए और माँ पार्वती से विवाह करने के लिए तैयार हुए थे। मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव और माँ पार्वती का विवाह गौरी कुण्ड से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित त्रियुगीनारायण मंदिर में विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ था।

भगवान गणेश से जुड़ी गौरी कुण्ड की कथा

भगवान गणेश जी से सम्बन्धित कथाओं के अनुसार उनका जन्म माँ पार्वती के गर्भ से नही हुआ था बल्कि उन्होंने अपने शरीर के मैल से उनका निर्माण किया था। एक बार माँ पार्वती इसी गौरी कुण्ड में स्नान करने जा रही थीं तभी जाते वक्त माँ पार्वती ने भगवान गणेश को द्वार पाल के रुप में नियुक्त कर दिया था और किसी को भी उस कुण्ड तक प्रवेश ना करने की आज्ञा दी थी। उसी समय शिव जी वहाँ आ पहुँचे माँ पार्वती के कहेनुसार गणेश जी ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने गणेश जी का मस्तक काटकर अलग कर दिया। बाद में माँ पार्वती ने जब क्रोधित होकर भगवान गणेश जी के मस्तक को पुनः जोड़ने को कहा तब शिव जी ने हाथी के बच्चे का मस्तक जोड़कर उन्हें पुनः जीवित किया।

स्कन्द पुराण में भी है गौरी कुण्ड मंदिर का वर्णन

पुराने साधुओं और ऋषि-मुनियों के अनुसार इस कुण्ड की प्राचीन कथाओं और महत्वपूर्ण बातों का वर्णन भी स्कन्द पुराण में मिलता है। माँ पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए इसी मंदिर में हजारो वर्ष तक तपस्या की थी इसके अलावा इस कुण्ड के बारे में एक खास महत्व को भी बताया जाता है कि जिन कन्याओं का लम्बे समय से विवाह नही हो पा रहा और विवाह में बाधाएं आ रही हैं तो ऐसे में गौरी कुण्ड के जल से आचमन करें, ऐसा करने से विवाह जल्दी से तय हो जायेगा तथा जिन महिलाओं को संतान नही हो पा रहा तो उन्हें भी इस जल के आचमन से जल्द ही संतान प्राप्ति के योग बनेंगे। एक और मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि यहाँ स्थित कुण्ड का जल पी लेने से चर्म रोग से सम्बन्धित बीमारी भी दूर हो जाती है।

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गौरी कुण्ड मंदिर का आकर्षण

बात करें गौरी कुण्ड मंदिर के प्रमुख आकर्षक की तो यहाँ पर आपको रहने और खाने-पीने की सभी सुख-सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां का पूरा क्षेत्र पवित्रता तथा अध्यात्म के सुगंध से सुगंधित है यहां आने वाले श्रद्धालुओं को यहां के पर्वतीय आकर्षण भी कई तरह से देखने को मिलते है। बर्फ के चादरों से ढ़की हिमालय की खूबसूरती देखने लायक है।

इस मंदिर के पहाड़ी क्षेत्र में होने के कारण इसकी सुन्दरता और ज्यादा मनमोहक हो जाती है। इस मंदिर में एक विशेष प्रकार की वास्तु कला और सरलता देखने को मिलती है तथा इस मंदिर के अन्दर माँ पार्वती की मूर्ति की स्थापना के साथ-साथ शिवलिंग की भी स्थापना की गई है।

इस आकर्षक मन्दिर का निर्माण पत्थरों और ढ़ालगढ़ी एक प्रकार के पत्थर  से किया गया है। यह पत्थर उत्तराखण्ड राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में ही पाया जाता है आपको बता दें कि इन पत्थरों का उपयोग केवल धार्मिक स्थलों को बनाने के लिए ही किया जाता है।

यह मंदिर धार्मिक पर्यटक स्थल और छोटे-छोटे आकार वाली मूर्तियों के कारण काफी आकर्षक है। चारो ओर पहाड़ियों से घिरे होने के कारण यहाँ का नजारा अत्यन्त मनमोहक होता है। इस मंदिर में प्रत्येक वर्ष आने वाले शिवरात्रि, नवरात्रि इत्यादि सभी त्योहारों को भी बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।

गौरी कुण्ड जाने का सही समय

यदि आप गौरी कुण्ड जाकर दर्शन करने की सोच रहे हैं तो वहाँ जाने का सबसे मनमोहक महीना मार्च से नवम्बर तक के बीच का हो सकता है। इस समय आप यहाँ के पहाड़ों पर बर्फ की सफेद चादर को देखने के साथ-साथ यहाँ पर होने वाली बर्फबारी का भी आनन्द उठा सकते हैं। इस समय जाने का सबसे महत्वपूर्ण फायदा यह है कि इस वक्त केदारनाथ धाम के कपाट भी खुले रहते हैं।

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गौरी कुण्ड में स्थित गौरी झील

यहाँ स्थित गौरी झील को पार्वती सरोवर या कम्पास झील के रुप में भी जाना जाता है। सभी भारतीय इस झील को एक पवित्र स्थान मानकर यहाँ स्नान करने के लिए आते हैं। वर्तमान समय में दुःख की बात तो यह है कि 2013 में आये हुए बाढ़ के बाद कुण्ड के स्थान पर केवल पानी की एक पतली सी धारा बहती है।

 

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