केदारनाथ धाम के रोचक रहस्य, 400 सालों तक बर्फ में दबा रहा 2023 | Kedarnath Benefit |

वर्तमान समय में लगभग सभी लोग केदारनाथ मंदिर की महिमा से परिचित है। यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है तथा इस मंदिर मे उपस्थित शिवलिंग को देश को 12 ज्योतिर्लिंगो मे से एक माना जाता है जिससे इसकी महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। यह मंदिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य में गिरिराज हिमालय की केदारनाथ की चोटी पर स्थित है। इस मंदिर से जुड़ी कई रहस्यमयी एवं रोचक बातें हैं और उन रहस्यमयी बातों में से कुछ को हम अपने इस लेख द्वारा जानेंगे।

कैसे हुई केदार नाथ में शिवलिंग की उत्पत्ति

एक पौराणिक कथा के अनुसार हिमालाय के केदार चोटी पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थें उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिया और उनके प्रार्थना के अनुसार ज्योतिर्लिंग के रुप में सदा वहां वास रहने का वरदान दिया। यह स्थान पर्वत राज हिमालय के केदार धाम नाम चोटी पर स्थित है तथा केदार घाटी में दो पहाड़ी है जिसमें एक का नाम नर तथा दूसरें का नाम नारायण पर्वत है। दूसरी ओर बद्रीनाथ धाम है जहां भगवान विष्णु विश्राम करत है। कहा जाता है कि सतयुग में बद्रीनाथ धाम की स्थापना स्वयं नारायण ने की थी।

केदारनाथ एवं पशुपतिनाथ के शिवलिंग से जुड़ा अनूठा रहस्य

केदारनाथ का मंदिर रुद्र प्रयाग जिले में उपस्थित है इसे अर्द्ध ज्योतिर्लिंग कहते है। यह ज्योतिर्लिंग नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर को मिलाकर पूर्ण होता है। यहाँ पर स्थित स्वयं भू शिवलिंग अति प्राचीन है यहाँ के मंदिर का निर्माण जन्मेजय ने कराया था।

पांडव कथा

महाभारत के अनुसार कहा जाता है कि जब पांडवों को स्वर्ग प्रयाण के समय शिव जी ने भैंसे के रुप में दर्शन दिया था और बाद मे वह धरती मे समा गये लेकिन वह पूर्ण रुप से नही समा पायें क्योंकि पूर्ण रुप से समाने के पहले ही भीम ने उनकी पूंछ पकड़ ली और जहाँ भीम ने शिव के भैसे अवतार में पूंछ पकड़ा वहीं स्थान वर्तमान में केदारनाथ कहलाया तथा जिस स्थान पर उनका मुख धरती से बाहर आया उसे पशुपति नाथ धाम कहते है। जो नेपाल में स्थित है। इस कथा का पूर्ण उल्लेख पुराणों मे पंच केदार की कथा मे मिलता है।

कैसे बना यह मंदिर

शिवजी का यह प्रसिद्ध मंदिर कटवां पत्थरों के भूरे रंग के विशाल और ठोस शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। 6 फुट ऊँचे चबूतरे पर खड़े 25 फुट ऊँचे 187 फुट लम्बे और 80 फुट चौड़े मंदिर की दीवारें 12 फुट मोटी है जिसमें सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि इतने वजनयुक्त पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर व तराशकर कैसे मंदिर का रुप दिया गया और विशेषकर विशालकाय छत कैसे खंभों पर रखी गई होगी।

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तूफान एवं बाढ़ में भी कैसे बना रहता है सुरक्षित

जब 16 जून 2013 की रात्रि में प्रकृति ने अपना कहर बरसाया तो जल प्रलय से कई बड़ी-बड़ी इमारते ताश की भाँति दह गई परन्तु वहाँ स्थित केदारनाथ मंदिर का भी कुछ नही हुआ। सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि जब पानी के बहाव में लुढ़कती हुई विशालकाय चट्टान आई और अचानक मंदिर के पीछे रुक गई जिसके कारण जल की धारा दो भागों में विभक्त हो गई और मंदिर अधिक सुरक्षित हो गया।

निरन्तर बदलती रहती है प्रकृति

केदारनाथ 3 पहाड़ियों के साथ-साथ पांच नदियों का संगम है यह नदियाँ मधुगंगा, क्षीर गंगा, सरस्वती, मंदाकिनी, स्वर्णगौरी। इन नदियों में अलकनन्दा की सहायक नदी मंदाकिनी आज भी उपस्थित है और इसी के किनारे पर केदारनाथ धाम स्थित है जहां पर सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश होता है। इस स्थान पर कब बादल फट जाएं और कब बाढ़ आ जाए कोई नही जानता  इसके बावजूद भक्त बड़ी संख्या मे यहां दर्शन के लिए आते हैं तथा शिव जी का आशीर्वाद प्राप्त करते है।

क्यों नही 6 माह तक बुझता दीपक

हम सभी दीपावली के पावन पर्व को भली-भाँति जानते है। दीपावली के दूसरे दिन के शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिये जाते है। जिसके अन्दर 6 माह तक दीपक जलता रहता है तथा पुरोहित सस्म्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते है। 6 माह तक उस मंदिर के आस-पास कोई नही रहता है इसके बावजूद 6 माह तक दीपक जलता रहता है। प्रतिदिन पूजा होती है तथा जैसे मंदिर का कपाट खोला जाता है मंदिर का दृश्य बिल्कुल पहले की तरह साफ-सुथरा रहता है। जैसे मंदिर की कपाट बंद करने से पहले था।

सबसे अधिक ऊँचाई पर बसा है जो पत्थरों के शिलाखण्डों को जोड़कर बनाया गया है।

400 वर्षों तक मंदिर में दबा रहा रहस्य

वर्तमान समय में स्थित केदारेश्वर मंदिर सर्वप्रथम पांडवों ने बनवाया था परन्तु बढ़ते समय के साथ यह मंदिर विलुप्त हो गया। उसके बाद 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने एक नये मंदिर की स्थापना करायी जो 400 वर्षों तक बर्फ में ढका रहा उस समय मंदिर का निर्माण 508 ईसा पूर्व जन्में और 476 ईसा पूर्व देहत्याग गए आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इस मंदिर के पीेछे उनकी समाधि है।

चार सौ वर्षों तक यह मंदिर बर्फ में दबा रहा परन्तु जब बर्फ से बाहर निकला तो पूरी तरह सुरक्षित था। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह माना जाता है कि केदारनाथ मंदिर जहां स्थित है वहा चारों ओर ग्लेशियर है तथा ग्लेशियरों के लगातार पिघलते और चट्टानो के खिसकते रहने के कारण यहाँ पर जल प्रलय एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं के आने की संभावना अधिक रहती है।

केदारनाथ एवं रामेश्वरम मंदिर का रहस्य

रामेश्वरम मंदिर की सीध में केदारनाथ मंदिर को बना हुआ मानते है जिससे यह कहा जाता है कि यह दोनो मंदिर एक ही रेखा पर बने है। इसके अलावा दोनों मंदिर के बीच में कालेश्वर, श्रीकालाहस्ती मंदिर, अरुणांचल मंदिर, एकम्बेरेश्वर मंदिर, तिलई, नटराज मंदिर और रामेश्वरम मंदिर आता है। इसमें व्याप्त शिवलिंग पंचभूतों के प्रतीक है।

कब होगा केदारनाथ लुप्त

कई पौराणिक मान्यताओं एवं भविष्यवाणियों के अनुसार इस पूरे क्षेत्र में व्याप्त तीर्थ लुप्त हो जायेंगे क्योंकि माना जाता है जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जायेंगे उस दिन बद्रीनाथ का मार्ग पूर्ण रुप से बन्द हो जायेगा। जिसके कारण भक्त यहाँ दर्शन के लिए नही आ पायेंगे। जब बद्रीनाथ और केदारेश्वरम धाम लुप्त हो जायेंगे तो कई वर्षों के पश्चात भविष्य बद्री नामक नये तीर्थस्थल का उद्गम होगा।

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केदारनाथ

केदार उत्तराखण्ड का अत्यधिक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है ये दर्शन के लिए केवल 6 माह तक ही खुला रहता है जिसे वैशाख माह के बाद खोला जाता है। केदारनाथ को तीन भागों मे बांटा गया है। पहला-गभगृह, दूसरा-दर्शन मंडप, तीसरा-सभा मंडप। ये मंदिर एक एक छह फीट ऊँचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है तथा बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रुप में विराजमान है। प्रसिद्ध बारह ज्योतिर्लिंगो में केदारनाथ धाम।