क्या है विपरीत राजयोग

ज्योतिष शास्त्र में कई प्रकार के योगों का उल्लेख मिलता है। कुछ योग जातकों को शुभ फल देते है तो कुछ योग अशुभ फल देते है। इस प्रकार सभी योगों का हमारे जीवन में अधिक महत्व है उन्हीं योगो मे से एक विपरीत राजयोग भी है जिसे हम विस्तार से ज्योतिषाचार्य के. एम. सिन्हा जी द्वारा इस लेख में समझेंगे।

विपरीत राजयोग का निर्माण:-

जन्म कुण्डली में ग्रहों के स्थितियों के कारण कई प्रकार के योग बनते है। जब कुण्डली में छठे, आठवे एवं द्वादश भाव के स्वामी एक दूसरे के भावों के विराजमान हो तो विपरीत राजयोग का निर्माण होता हैअर्थात छठे भाव का स्वामी आठवे भाव में तथा आठवे भाव का स्वामी एवं द्वादश भाव का स्वामी छठे या आठवें में उपस्थित हो। ज्योतिष शास्त्र में इन भावों को त्रिक भाव तथा दुष्ट स्थान कहा जाता है। इस भाव के स्वामी प्रायः अशुभ फल देते है परन्तु विपरीत राजयोग के निर्माण स्वरुप इन भावों के फल शुभ मिलते है।

विपरीत राजयोग की भूमिकाः-

अन्य योगों की भांति विपरीत राजयोग भी हमारे जीवन को प्रभावित करता है। जिन जातकों की कुण्डली में विपरीत राजयोग का निर्माण होता है। उनको परिश्रम के बाद ही एक अच्छी सफलता मिलती है तथा समाज में मान, पद, प्रतिष्ठा बढ़ती है अर्थात आपको अच्छे फल की प्राप्ति आपके परिश्रमनुसार ही प्राप्त होगी। इस योग से कई बार ऐसे परिणाम भी प्राप्त होते है जिसे आपने कभी सोचा न होगा।

विपरीत राजयोग के प्रकारः-

हमारे ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तीन प्रकार के विपरीत राजयोग होते है जो इस प्रकार से हैः-
1. सरल विपरीत राजयोग
2. विमल विपरीत राजयोग
3. कठिन विपरीत राजयोग

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सरल विपरीत राजयोगः-

कुण्डली में सरल नामक विपरीत राजयोग का निर्माण तब होता है जब षष्ठम या द्वादश भाव का स्वामी अष्टम भाव में अथवा अष्टम एवं षष्ठम भाव का स्वामी द्वादश भाव में उपस्थित है। इस योग से आर्थिक क्षेत्र में सफलता मिलती है। धन-सम्पत्ति का विस्तार होता है एवं अपने परिश्रम द्वारा धन अर्जित करने मे सक्षम होते है। इसके साथ ही आपके ज्ञान में वृद्धि होगी तथा अपने सिद्धान्तों पर सदैव अटल रहेंगे। कोई भी फैसला बहुत ही सोच समझकर करते है इसके अलावा शत्रुओं का सामना करने में भी सक्षम होते है।

विमल विपरीत राजयोगः-

कुण्डली में विमल नामक विपरीत राजयोग का निर्माण तब होता है जब षष्ठम, अष्टम या द्वादश भाव का स्वामी द्वादश भाव में अथवा द्वादश भाव का स्वामी ग्रह षष्ठम या अष्टम भाव में स्थित हो। कुण्डली का द्वादश भाव खर्च कहलाता है जिसके फलस्वरुप आपको इस क्षेत्र में विपरीत परिणाम देखने को मिलते है। धन अर्जन के क्षेत्र में आपको सफलता मिलती है। समाज की कुरीतियों को दूर करने का भी प्रयास करते है तथा सभी कार्य नियम बंध तरीके से पूर्ण करते है। दूसरों की सहायता करने में सदैव आगे रहते है तथा स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीने में रुचि रखते है।

कठिन विपरीत राजयोगः-

कुण्डली में कठिन विपरीत राजयोग का निर्माण तब होता है जब षष्ठम भाव में कोई पाप ग्रह जैसे सूर्य, मंगल, केतु आदि में उपस्थित हो अथवा इस भाव का स्वामी षष्ठम, अष्टम या द्वादश भाव में उपस्थित हो। यह विपरीत राजयोगों में सबसे शुभ माना जाता है। इस योग के निर्माण से आपके पराक्रम में वृद्धि होती है और अपने पराक्रम द्वारा शत्रुओं का सामना करने में सक्षम होते है। समाज में मान, पद, प्रतिष्ठा बढ़ती है। स्वास्थ्य सम्बन्धित परेशानियों से भी राहत मिलती है और शारीरिक रुप से आप मजबूत अनुभव करेंगे। परिवार एवं वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहेगी। इस योग को हर्ष नामक विपरीत राजयोग के नाम से भी जाना जाता है।

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विपरीत राजयोग की अन्य कुछ बातेंः-

यदि आपकी कुण्डली में कई प्रकार के अशुभ योग बने हुए इसके साथ ही विपरीत राजयोग का निर्माा भी हुआ तो कई बुरे प्रभावों से यह योग आपको मुक्ति दिलाता है परन्तु आपको चिंता बनी रहेगी।

इस योग के बनने के बाद भी आपको अत्यधिक परिश्रम के बावजूद ही लाभ प्राप्त होता है अर्थात आपको अपने कार्यक्षेत्रों मे पहले अत्यधिक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा