चित्रगुप्त पूजा

क्या है चित्रगुप्त पूजा

दिवाली पाँच दिवसीय त्यौहार के अन्तिम दिन भाई-दूज का त्यौहार मनाया जाता है। हम पहले ही इसके बारे में आपको बता चुकें हैं और इसी दिन भगवान चित्रगुप्त के पूजा का विधान है और लेखनी पूजा भी की जाती है।

कौन है भगवान चित्रगुप्त

पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान चित्रगुप्त का जन्म बह्म जी के चित्त से हुआ था, भगवान चित्रगुप्त को देवताओं के लेखपाल और यम के सहायक के रुप पूजा जाता है, भगवान चित्रगुप्त का कार्य है, मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा करना, जैसा कि माना जाता है कि मनुष्य के मृत्य के पश्चात् उनके जीवन व मृत्य की अवधि का हिसाब-किताब उनके कर्मों के अनुसार ही लिखा जाता है और इसका पूरा विवरण भगवान चित्रगुप्त ही रखते है। ब्रह्म जी के काया से उनका उद्धव होने के कारण चित्रगुप्त जी का विवाह सूर्य की पुत्री यमी से हुआ था। इस प्रकार चित्रगुप्त जी यमराज के बहनोई भी थें।

चित्रगुप्त व्रत कथा

प्राचीन काल में सौदास नाम एक राजा था वह अत्यन्त अन्यायी तथा क्रूर था, उसने अपने जीवन काल में कोई भी अच्छा काम नही किया था, एक दिन वह टहलने निकला था, उस समय उसकी मुलाकात एक ब्राह्मण से हुई जो पूजा कर रहे थें, राजा के मन में जिज्ञासा जगी और उसने ब्राह्मण से पूछा कि वह किसकी पूजा कर रहे है, ब्राह्मण ने उत्तर दिया कि आज शुक्ल पक्ष का दूसरा दिन है इसलिए मै मृत्य के देवता यमराज और उनके सहायक मित्र चित्रगुप्त का पूजा कर रहा हूॅ, उनकी पूजा करने से नरक से मुक्ति मिलती है और मनुष्य के बुरे कर्मों को भी कम करती है, यह सुनने के पश्चात सौदास ने भी अनुष्ठानों का पालन किया और पूजा भी की। बाद में जब राजा की मृत्यु हुई तो उसको यमराज के पास ले जाया गया और भगवान चित्रगुप्त ने राजा सौदास के कर्मों की जांच कि और यमराज को सूचित किया कि राजा पापी है परन्तु उसने यमराज की पुजा पूरी श्रद्धा और अनुष्ठान के साथ किया है इसलिए उसे नरक नही भेजा जा सकता। इस प्रकार केवल एक दिन की पूजा करने से राजा अपने सभी पापों से मुक्त हो गया।

चित्रगुप्त पूजा का महत्व

भगवान चित्रगुप्त मुख्य रुप से लेखा-जोखा रखने का कार्य करते है। इसलिए इनके मुख्य कार्य को लेखनी के रुप से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि भैयादूज के दिन चित्रगुप्त जी के प्रतिरुप के तौर पर कलम का पूजा किया जाता है। मान्यता यह है कि भगवान चित्रगुप्त की पूजा करने से बुद्धि, वाणी और लेखनी का आशीर्वाद भी मिलता है। कायस्थ कुल के लोगो को भगवान चित्रगुप्त का वंशज माना जाता है। इसी कारण कायस्थ परिवार के लोग भगवान चित्रगुप्त जी का पूजन और उनके साथ कलम का पूजन विशेष रुप से करते है, व्यवसाय से जुड़े लोगो के लिए भी इस पूजा का बहुत महत्व होता है। इसी दिन नए बहीखातों पर ‘श्री’ लिखकर कार्य का आरम्भ किया जाता है और कारोबारी अपने कारोबार से जुड़े आय-व्यय का ब्योरा भगवान चित्रगुप्त जी के सामने रखते है और भगवान चित्रगुप्त से व्यापार में आर्थिक उन्नति का आशीर्वाद मांगते है।

चित्रगुप्त पूजा विधि

☸ सर्वप्रथम पूजा स्थान साफ करके एक कपड़ा बिछा ले और वहाँ चित्रगुप्त जी की फोटो रखें।
☸ तत्पश्चात् दीपक जलाएं और भगवान गणेश जी को चन्दन, रोली, हल्दी और अक्षत से तिलक करें।
☸ उसके बाद भगवान चित्रगुप्त जी को फल, मिठाई, पान-सुपारी, दूध-घी और अदरक-गुड़ से बने पंचामृत का भोग भी लगाएं।
☸भोग लगाने के पश्चात् परिवार के सभी सदस्य अपनी किताब, कलम की पूजा करके चित्रगुप्त जी के समक्ष रखें और उनकी आरती भी करें।
☸ अन्त में सफेद कागज पर स्वास्तिक बनाकर उस पर अपनी आय और व्यय का विवरण देकर उसे चित्रगुप्त जी को अर्पित कर पूजन करें।

चित्रगुप्त पूजा मंत्र

मसिभाजनसंयुक्तं ध्यायेतं च महाबलम्।
लेखिनीपटिकाहस्तं चित्रगुप्तं नमाग्यहम्।।

चित्रगुप्त जी की आरती

श्री विरंचि कुलभूषण, यमपुर के धामी। पुण्य पाप के लेखक, चित्रगुप्त स्वामी।।
सीस मुकुट, कानों में कुण्डल अति सोहे। श्यामवण शशि सा मुख, सबके मन मोहे।।
भाल तिलक से भूषित, लोचन सविशाला। शंख सरीखी गरदन गले मे मणि माला।।
अर्ध शरीर जनेऊ, लम्बी भुजा छाजै। कलम दवात हाथ में पादुक परा भ्राजे।।
नृप सौदास अनर्थी, था अति बलवाला। आपकी कृपा द्वारा, सुरपुर पग धारा।।
भक्ति भाव से यह आरती जो कोई गावे। मनवांछित फल पाकर सद्धति पावे।।

शुभ तिथिः- 26 अक्टूबर 2022
द्वितिया तिथि प्रारम्भः- 26 अक्टूबर दोपहर 02ः00 बजकर 42 मिनट से
द्वितिया तिथि समापनः- 27 अक्टूबर दोपहर 12ः45 बजे तक

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