जब राहु केतु का आस्तित्व ही नहीं तो क्यों करते हैं इतना प्रभाव राहु केतु पर सबसे बड़ा शोध

आज हम बात करेंगे राहु और केतु ग्रह के बारे में एक अनोखा शोध की तो जो भी चीज हमारे ऋषि मुनियों ने ज्योतिष में लिखा है उसके पीछे कुछ तो कारण अवश्य होगा इस कारणों को जानने की पूरी तरह से कोशिश की गई है। सबसे पहला प्रश्न तो यह उठता है कि राहु केतु को क्यों अलग-अलग दो हिस्सों में नाम दिया गया। कहा जाता है कि राहु के पास केवल सिर होता है और केतु के पास केवल धड़ होता है यह दोनो ही एक पूरा शरीर नहीं होते हैं। क्योंकि यह दोनो ही अमर होते हैं इसको ही छाया ग्रह भी माना जाता है। भले ही राहु केतु का नाम दोनो एक साथ ही आता है परन्तु, इस ब्लाॅग में हम केतु के बारे में पूरी जानकारी हमारे योग्य ज्योतिषाचार्य के. एम. सिन्हा जी के द्वारा समझते हैं।

देखिये सात ग्रहों को तो हम देखते ही हैं लेकिन राहु और केतु हमे दिखाई नही देता हैं। जो छात्र ज्योतिष का ज्ञान ले रहे हैं उन्हें राहु और केतु को लेकर दुविधा हर समय लगी रहती है। बहुत से लोग कहते हैं की केतु की दृष्टि होती है परन्तु जब केतु के पास सिर ही नहीं है तो दृष्टि कहाँ से होगी। वह केतु को एक इंसान के तरीके से देखने की कोशिश करते हैं। लेकिन बृहस्पति देव की जो पाँचवी, सातवीं और नौवीं दृष्टि होती है वह किसने देखा है वह भी आप कैसे बता सकते हैं की बृहस्पति की यह दृष्टियाँ होती हैं। इसके अलावा मंगल की भी तीन दृष्टियाँ चैथी, सातवीं और आठवी होती हैं। शनि की भी तीन दृष्टियाँ तीसरी, सातवी और दसवीं होती है।

ज्योतिष विज्ञान में यह भले ही कहा गया है की राहु सिर वाला हिस्सा और केतु धड़ वाला हिस्सा है। राहु और केतु कैसे और क्यों बनते हैं ये तो सभी को पता होगा क्योंकि राहु और केतु का जो निर्माण होता है वो पृथ्वी और चंद्रमा की जो कक्षा होती है जहाँ पर दो बिन्दु कट करते हैं उसमें से एक को उत्तरी नोड कहते है जिसको राहु और एक को दक्षिणी नोड़ जिसे केतु कहते हैं। तो ये जो पृथ्वी और चन्द्रमा का अक्ष होता है वह हमारे पृथ्वी की कक्षा से 5 डिग्री झुका होता है इसलिए जब कभी भी सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी ये सभी एक सीध में आ जाते हैं जो सूर्यग्रहण नही होता है और जब सूर्य और चन्द्रमा के बीच में पृथ्वी आ जाती है तो हमेशा चन्द्रग्रहण नही होता है। यह अपने एक विशिष्ट समय में होता है जब यह नोड़ यहाँ पर काम करते है।

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यानि पाँच बिन्दु वहाँ पर काम करते हैं तो ग्रहण लगेगा अन्यथा किसी तीन बिन्दु के एक साथ होने पर ग्रहण नही लगता है। तो ऐसे में केतु और राहु को अगर दंेखा जाए तो यह भी दोनो बिन्दु होते है और यह दोनों ही बिन्दु आपको दिखाई नही देते हैं। लेकिन यह बात तो बिल्कुल सत्य है कि जैसे ही यह सारे ग्रह एक सीध में हो जाते है तो ऐसी स्थिति में चन्द्रग्रहण के समय पृथ्वी पर जो सूर्य की किरणें पड़ती है उसकी छाया उसी समय पड़ती है जब यह नोड लाइन में होते हैं। यानि राहु केतु कभी एक दूसरे से मिल भी नहीं सकते हैं क्योंकि चन्द्रमा और पृथी के बीच में दो 180 डिग्री पर जुड़ाव होता है। इसके अलावा जैसे-जैसे यह पृथ्वी जिस दिशा में चक्कर लगाती है उसके विपरीत दिशा में हमें राहु और केतु की गति प्रारम्भ होती दिखाई देती है इसलिए इनको वक्री ग्रहों की संज्ञा दी जाती हैं।
बात करते हैं केतु के बारे में क्यों इनका सिर और धड़ अलग कहा गया है क्योंकि केतु और राहु दोनो कभी आपस में मिलते ही नहीं हैं एक हमारी पृथ्वी के दायी तरफ रहते हैं और एक पृथ्वी के बायीं तरफ रहते हैं। दोनो ही इस तरीके से रहते है की इन दोनों के बीच की जो दूरी हो वह 180 डिग्री हो। इसलिए हमारे ऋऋषि मुनियों ने यह जरूर लिखा है कि एक सिर है एक धड़ हैं।

जब कभी भी सिर की बात करते हैं क्योंकि दोनों छाया उत्पन्न करते हैं एक बार पृथ्वी की छाया जो पड़ती है चन्द्रमा पर और चन्द्रमा की जो हाया है वह पृथ्वी पर पड़ती है और यह पड़ती कब है जब पूरी नोड एक लाइन में बन जाते हैं। यह दोनों ही छाया एक साथ कभी नही पड़ती है इसलिए एक राहु और एक केतु कहे जाते हैं। जो चिज सूर्य के पास ज्यादा रहता है उसे राहु कहते हैं और जो सूर्य से ज्यादा दूर होते हैं उसे केतु कहा जाता है।

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यदि आपकी कुण्डली में केतु है तो उसके बारे में जान लेना अति आवश्यक होता है। केतु को एक असंतुष्ट ग्रह क्यों कहा जाता है? क्यों ऐसा कहा जाता है कि केतु जो है आपके लिए कभी भी इच्छाओं की समाप्ति होगी ही नहीं अगर केतु होगा। क्योंकि केतु हमेशा चन्द्रमा वाले क्षेत्र में ज्यादा रहता है तो चंद्रमा का प्रभाव मन पर होता है जबकि सूर्य के प्रभाव से राहु होता है। यदि सूर्य क्रूर ग्रह है तो राहु को मायावी कहा जाता है क्योंकि यह एक छाया होता है इन्ही छाया के कारण पृथ्वी पर पड़ने वाली छाया को राहु काल कहा जाता है, और प्रत्येक दिन अलग- अलग समय पर राहु काल होता है। सूर्य के अत्यधिक पास होने के कारण उनके अन्दर सूर्य जैसी ऊर्जा आ जाती है। इसलिए राहु एक शुभ ग्रहों की श्रेणी में नहीं आता है और आपको निश्चित रुप से प्रभावित भी करता है।

केतु के बारे मे बात करे क्योंकि यह चंद्रमा के समीप रहता है लेकिन इसका जो प्रभावित क्षेत्र है वह चन्द्रमा के पास का होता है और चन्द्रमा हमारा मन होता है और राहु आत्मा होता है इसलिए ज्योतिष में इन दोनो ग्रहों को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है। बाकी जगह पर भी राहु और केतु वाली प्रवृत्ति हो सकती है क्योंकि हर जगह पर सभी के पास चंद्रमा होता है जैसे मंगल के पास दो चन्द्रमा होते है। यदि मंगल पर जीवन होता तो वहाँ पर भी ग्रहण देखने को मिलता और वहाँ पर भी कोई न कोई छाया ग्रह बनते।

क्योंकि यहाँ हम पृथ्वी पर रहते हैं इसलिए केवल हम पृथ्वी की बात करेंगे और सूर्य और चन्द्र की घटना की बात करें तो जहाँ चन्द्रमा होगा वहाँ यह घटना होगी ही चाहे वह बृहस्पति की बात करें जहाँ पर सौ से ज्यादा चन्द्रमा होते है जिसमें से 66 चन्द्रमा को अभी तक हटा दिया गया है। शनि के पास भी चन्द्रमा होता है बुध और शुक्र के पास कोई भी चन्द्रमा नही होता है इसलिए वहाँ पर कोई ग्रहण नही होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन ग्रहों की कक्षा नहीं होती है।

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केतु को एक असंतुष्ट ग्रह इसलिए कहा गया है क्योंकि केतु हमारे मस्तिष्क पर प्रभाव देता है चन्द्रमा मन होता है और सूर्य पिता होते है आत्मा होते हैं। सूर्य देखा जाए तो क्रोधी स्वभाव का होता है। सूर्य प्रशासनिक चीजों के लिए जाने जाते हैं, पित्त को देखा जाता है उसी तरीके से राहु जो होता है, क्योंकि छाया होने के कारण यह वायु तत्व की श्रेणी में आता है। इसी तरह से जो केतु होता है उसका प्रभाव चन्द्रमा के पास होता है। चन्द्रमा और बृहस्पति का हमारे मन पर ज्यादा प्रभाव होता है इसलिए इसको बृहस्पति और मंगल के समान भी फल देने वाला ग्रह कहते हैं।

देखा जाए तो राहु केतु का अस्तित्व नहीं है फिर भी यह हम पर असर देते हैं इसका सीधा यह कारण है कि जब चन्द्रग्रहण होता है या सूर्यग्रहण होता है तो राहु और केतु की छाया में हम आ जाते है जिसके कारण ऊर्जा वाली किरणें रुक जाती हैं और हमारे शरीर को ऊर्जा नही मिल पाती है। इन्ही कारणों से यदि ऊर्जा का प्रवेश द्वार बन्द हो जाए तो हमारे लिए परेशानी उत्पन्न हो सकता है। यहाँ तक उम्मीद है आपको राहु केतु के बारे में जानकारी हमारे द्वारा मिल गई होगी इसके अगले ब्लाॅग में हमारी कुण्डली के सभी भावों में केतु कैसा परिणाम देगा इसे हम देखेंगे।

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