ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जानें पूजा-पाठ में कलश का प्रयोग क्यों करते है ?

बात करें यदि हम कलश कि तो हिन्दू धर्म में पूजा-पाठ और किसी भी मांगलिक कार्यों के दौरान पूजा-पाठ करने से पहले कलश स्थापित करने का विशेष महत्व होता है। हिन्दू धर्म शास्त्र तथा ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार हमारे द्वारा स्थापित किये गये कलश को सुख-समृद्धि वैभव तथा मंगलकामनाओं का प्रतीक माना जाता है। इसके अलावा हिन्दू धर्म में उस पवित्र कलश के मुख वाले भाग  में भगवान विष्णु, कलश के कंठ वाले भाग में भगवान शिव और कलश के मूल में भगवान ब्रह्मा जी का वास होता है। मान्यता के अनुसार इस छोटे से कलश मात्र में इस सृष्टि के सम्पूर्ण सभी देवी-देवताओं की शक्ति समाहित होती है। अतः आपको बता दें पूजा के दौरान स्थापित करने वाले कलश को देवी की शक्ति तथा तीर्थस्थान इत्यादि का प्रतीक मानते हुए ही पूजा स्थान पर स्थापित किया जाता है।

पूजा के दौरान कलश कैसा होना चाहिए

पूजा के दौरान पूजा से पूर्व स्थापित होने वाले कलश की बात करें तो हमें पूजा करने के लिए किसी तरह का कलश लेना है या किसी तरह के कलश से पूजा पाठ करना चाहिए, इन सब की जानकारी अपने पास अवश्य रखनी चाहिए। इसके अलावा पूजा के दौरान कभी भी लोहे के कलश का प्रयोग नही करना चाहिए। कलश का ध्यान रखने के साथ-साथ कलश स्थापित करने के लिए उसकी सही दिशा का ज्ञान होना भी बेहद जरुरी होता है, कलश स्थापित करते समय कलश को हमेशा उत्तर या उत्तर पूर्व दिशा में ही स्थापित करना चाहिए।

किन चीजों से बना हुआ कलश प्रयोग करें

पूजा-पाठ के दौरान पूजा में सोने, चांदी, मिट्टी और ताँबे का कलश रख सकते हैं इसके अलावा कभी-कभी कलश को लाल वस्त्र, नारियल, आम के पत्ते और कुशा की मदद से तैयार करके भी प्रयोग किया जाता है।

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किस प्रकार कलश से प्राप्त हुई थीं माता सीता

एक बार की बात है त्रेता युग में राजा जनक जब खेत में हल चला रहे थें तब वही हल भूमि के अन्दर गड़े हुए कलश पर जाकर टकरा गया। उसके बाद जब राजा जनक ने उस कलश को बाहर निकाला तो उसमें से एक कन्या प्राप्त हुई जिस कन्या का नाम सीता रखा गया। इसके बाद यह समुंद्र मंथन के समय अमृत कलश प्राप्त हुआ था। अतः ऐसे ही माँ लक्ष्मी के सभी चित्रों में कलश को मुख्य रूप से दर्शाया जाता है। इन्हीं कारणों से पूजा में कलश की स्थापना करने की परम्परा पुराने समय से ही चली आ रही है।

कलश स्थापित कब-कब किया जाता है

कलश को स्थापित करके पूजा-पाठ करने के लिए हिन्दू धर्म में ऐसे बहुत से मौके आते हैं जैसे, नवरात्रि, दीपावली पूजन, गृह प्रवेश पूजन, अक्षय तृतीया पूजन इत्यादि इन सभी त्योहारों में कलश स्थापित करने का अलग महत्व होता है। किसी भी घर में कलश को पूजा घर और मुख्य द्वार पर रखना अत्यन्त ही शुभ माना जाता है। अतः दोनों ही स्थानों पर रखे जाने वाले कलश में एकदम साफ और पवित्र नदी का जल भरकर ही रखना चाहिए और यदि आपके पास किसी पवित्र नदी का जल न हो तो साफ पानी में गंगाजल डालकर भी रख सकते हैं।

द्वार पर कलश रखने के लाभ

घर के बाहर कलश रखने का तरीका भी विधि-विधान से ही होना चाहिए. यदि आप घर के द्वार पर कलश रख रहे हैं तो यह अवश्य ध्यान रखें की उसका मुंह चौड़ा और खुला हो जिसमें की आम के ताजे पत्ते और अशोक के पेड़ की पत्तियाँ आराम से रख सकते हैं। शास्त्रों के अनुसार आम के पत्तों का संबंध बुध ग्रह से होता है ऐसे में आपके दरवाजे के पास रखा गया कलश आपके घर में सुख समृद्धि और सम्पन्नता लेकर आता है साथ ही घर में आयी हुई नकारात्मक ऊर्जाओं को रोकने का काम करता है।

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कलश स्थापना करने के नियम

☸ वास्तु और ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पूजा में प्रयोग किये जाने वाले मंगल कलश की स्थापना हमेशा ईशानकोण में ही की जाती है।

☸ पूजा करते समय कलश जहाँ पर स्थापित करना हो वहाँ पर हल्दी से अष्टदल बनायें, उसके ऊपर चावल रखें चावल के ऊपर कलश रख दें।

☸ कलश रखने के बाद उसमें जल, दूर्वा, चंदन, पंचामृत, सिक्का, लौंग, हल्दी, सुपारी, पान तथा इलाइची इत्यादि सब शुभ चीजे डालें, उसके बाद उसके ऊपर रोली से स्वास्तिक बनायें कलश पर बनने वाला यह स्वास्तिक का चिन्ह चारो युगों के प्रतीक के रूप में माना जाता है।

☸ कलश के ऊपर आम के पत्तों के साथ नारियल रखा जाता है, कुछ लोगों के द्वारा कलश के ऊपर लाल कपड़े से लपेटकर भी रखा जाता है उसके बाद कलश के पास धूप और दीप जलाकर उस कलश का पूजन किया जाता है।