ज्योतिष में  राशि,भाव एवं शरीर के अंग

शास्त्रों के अनुसार जिस प्रकार राशि और कुण्डली में स्थित अनेक ग्रहों के माध्यम से जातक के भूत, भविष्य और वर्तमान से सम्बन्धित जानकारी का पता लगाया जा सकता है ठीक उसी प्रकार से ग्रहों के माध्यम से ही जातकों को होने वाले रोग के बारे में भी चेतावनी दी जा सकती है। ज्योतिष शास्त्र के ग्रन्थों में एक व्यक्ति के शरीर के अंगों में मेष से लेकर मीन तक इन 12 राशियों को स्थापित किया गया है और इन्हीं राशियों की मदद से होने वाले रोगों के बारे में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है कि हमारा शरीर और विशेष रूप से शरीर के अंग पूरी तरह से स्वस्थ है या फिर रोगग्रस्त हैं।

राशि और भाव के अनुसार कालपुरूष विचार

कालपुरुष शब्द का प्रयोग देखा जाए तो ज्योतिष में ही किया जाता है। साधारण से शब्दों में हम कहें तो एक अलौकिक मानव जिसमें एक व्यक्ति के जीवन के सभी चक्रों को देखा जाता है उसे कालपुरुष कहा जाता है। आपको बता दें भचक्र की विभिन्न राशियाँ कालपुरुष के शरीर पर ही स्थित होती हैं। अतः जो राशि कालपुरुष के जिस अंग पर पड़ती है वास्तव में वह राशि ही उस अंग का प्रतिनिधित्व करती है।

वामन पुराण के अनुसार भगवान शिव का शरीर कालपुरुष का प्रतिनिधित्व करते हैं तो आइए विस्तार से कालपुरुष के अंगों में राशियों के स्थान को भली भाँति जानते हैं-

क्रम        राशि       शरीर के अंग

1              मेष          मस्तक

2              वृषभ      मुख

3              मिथुन     कंधे, गर्दन तथा स्तनों का मध्य भाग

4              कर्क       हृदय

5              सिंह        पेट (ऊपरी उदर)

6              कन्या      नाभि (कमर और आँत)

7              तुला        नाभि के नीचे का भाग

8              वृश्चिक    बाहरी जननांग (गुप्तांग)

9              धनु          जांघे

10           मकर      दोनों घुटने

11           कुंभ        टाँगें (पाव)

12           मीन        पंजा

वराहमिहिर के द्वारा किया गया विभाजन बहुत आसान है इसमें से भचक्र की प्रारम्भिक चार राशियाँ कालपुरुष के सिर से मध्यपट तक तथा अगली चार राशियाँ मध्यपट से गुदान्त भाग तक इसके अलावा अन्तिम बची हुई चार राशियाँ कूल्हे से लेकर शरीर के निचले अंगों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

वर्तमान में अन्य योग्य ज्योतिषियों और ज्ञान के अनुसार जब हम कुण्डली के पृथक-पृथक भावों पर विचार करते हैं तो जातक के शरीर में हृदय के रोगों की विशेष जानकारी प्राप्त करने के लिए कुण्डली के पंचम भाव का विचार करना अत्यधिक उपयुक्त होता है।

प्रथम भाव

हमारी कुण्डली के प्रथम भाव से सामान्य रूप से शरीर के अंगो में मस्तिष्क, सिर, बाल, त्वचा, रूप, निद्रा तथा किसी प्रकार के रोगों से छुटकारा मिलने, इसके अलावा व्यक्ति की आयु, बुढ़ापा तथा कार्य करने की योग्यता और क्षमता की भी प्राप्ति होती है।

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वृषभ राशि

कुण्डली के द्वितीय भाव से मुख,दायीं आंख, दांत, जिह्म, मुख, तथा मुख का भीतरी भाग, नाक, जातक की वाणी, नाखून तथा व्यक्ति के मन की स्थिरता का पता चलता है।

तृतीय भाव

कुण्डली के तीसरे भाव से दायां कान, गले का भाग, कंधा तथा हाथ की भुजाएं, श्वसन प्रणाली, भोजन, नलिका, तथा अंगूठे से प्रथम उंगली तक का पूरा भाग, स्वप्न, मानसिक अस्थिरता इसके अलावा शारीरिक स्वास्थ्य तथा व्यक्ति के विकास के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है।

चतुर्थ भाव

कुण्डली के चतुर्थ भाव से व्यक्ति की छाती, फेफड़े तथा हृदय का भाग, स्तन, वक्षः स्थल की रक्त वाहिनियां, मध्यपट, प्रबल तथा प्रभावशाली औषधि के बारे में विशेष रूप से जानकारी प्राप्त करते हैं।

पंचम भाव

कुण्डली के पंचम भाव से विशेष रूप से व्यक्ति के हृदय, ऊपरी उदर तथा उसके अवयव जैसे आमाशय, यकृत, जिगर, पित्त की थैली, शरीर में उपस्थित तिल्ली, अग्नाशय, पक्वाशय, मन विचार, गर्भावस्था तथा नाभि से सम्बन्धित जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं।

षष्ठम भाव

कुण्डली के षष्ठम भाव से जातक के शरीर की छोटी आँत, आन्त्रपेशी, आन्त्रपुच्छ, बड़ी आँत का कुछ भाग, गुर्दा, ऊपरी मूत्र प्रणाली, मानसिक पीड़ा, अस्वस्थता, होने वाले घाव, कफ से सम्बन्धित रोग, क्षयरोग, गिल्टियाँ तथा छाले वाले रोग, व्याधि, छोटी माता, नेत्र रोग, विष, आमाशयी नासूर तथा (व्रण) इत्यादि से सम्बन्धित बातों के बारे में भी जानकारी प्राप्त की जाती है।

सप्तम भाव

कुण्डली के सप्तम भाव से जातक के शरीर में स्थित बड़ी आंत तथा मलाशय, निचला मूत्र प्रणाली तथा मूत्राशय, गर्भाशय, अण्डाशय, वृषण शिश्न ग्रन्थि, वीर्य थैली, मूत्रनली, गुदामार्ग, वीर्य तथा मैथुन से सम्बन्धित जानकारी प्राप्त होती है।

अष्टम भाव

कुण्डली के अष्टम भाव से बाहरी जननांग, गुदान्त भाग, गुदा द्वार, बाहृय यौनांग तथा अंगों की हानि यंग-भंग, चेहरे के कष्ट, दीर्घकालिक या होने वाले असाध्य रोग, व्यक्ति की आयु, तीव्र मानसिक वेदना तथा ऊरुसन्धि के बारे में भी जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं।

नवम भाव

कुण्डली के नवम भाव में व्यक्ति के जांघों, कूल्हों, पोषण तथा जांघों की रक्त वाहिनियों के बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है।

दशम भाव

कुण्डली के दशम भाव से व्यक्ति के घुटनों, घुटनों की चक्की तथा घुटने के जोड़े के पिछले रक्त भाग की जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं।

एकादश भाव

कुण्डली के एकादश भाव से जातक की टांगे, बायाँ कान, वैकल्पिक रोग स्थान तथा आरोग्य की प्राप्ति भी होती है।

द्वादश भाव

कुण्डली के द्वादश भाव से जातक की बायीं आँख, पैर, निंद्रा में आ रही बाधा, व्यक्ति का मानसिक असंतुलन, शारीरिक व्याधियाँ, अस्पताल में भर्ती होने जैसी स्थिति, दोषपूर्ण अंग तथा मृत्यु से सम्बन्धित विशेष जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं।

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विशेष

यहाँ पर ध्यान देने योग्य बातें यह है कि हमारे शरीर का दायां भाग कुण्डली के प्रथम भाव से सप्तम भाव तक तथा शरीर का बायां भाग कुण्डली के सप्तम से प्रथम भाव तक प्रदर्शित होता है। वराह मिहिर के अनुसार हृदय का क्षेत्र कालपुरुष का चैथा भाव हैं जो कि कर्क राशि हैं परन्तु वामनपुराण के अनुसार यह कालपुरुष का पांचवा भाव हैं जो कि सिंह राशि है।

द्रेष्काण तथा शरीर के अंग

देखा जाए तो किसी जातक की कुण्डली में रोग का स्थान निश्चित करने में द्रेष्काण की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानी जाती है। वास्तव में चिकित्सा ज्योतिष के सभी ग्रन्थ शरीर में रोग का स्थान निर्धारण करने के लिए द्रेष्काण की विशेष भूमिका पर ही बल देते हैं। द्रेष्काण के बारे में बात करें तो तीन द्रेष्काण शरीर के तीन भागांे का प्रतिनिधित्व करते हैं।  इसमें से पहला भाग सिर से मुंह तक, दूसरा भाग गर्दन से नाभि तक तथा तीसरा भाग नाभि से पैर तक होता है। जब कुण्डली में प्रथम द्रेष्काण उदित होता है तो कुण्डली के सभी भाव सिर से मुख तक के अंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि जब कुण्डली में प्रथम द्रेष्काण उदित होता है तो कुण्डली के सभी भाव सिर से मुख तक के अंग का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब लग्न में द्वितीय द्रेष्काण उदित होता है तो गर्दन से नाभि तक के अंग प्रतिरूपित होते हैं। ठीक इसी प्रकार से तृतीय द्रेष्काण के उदित होने पर बस्ति प्रदेश से आगे पैरों तक के शरीर के अंग हमारी कुण्डली के बारह भावों से निरूपित होते हैं। वहीं शरीर के दाहिने ओर के अंग कुण्डली के भाव संख्या 2 से 6 तथा र्बाइं ओर के अंग भाव संख्या 8 से 12 द्वारा निरुपित होते हैं।

वराहमिहिर तथा अन्य ग्रंथकारों के अनुसार कुण्डली में पहला, दूसरा और तीसरा द्रेष्काण के उदित होने पर हमारी कुण्डली में उपस्थित विभिन्न भावों द्वारा शारीरिक विशेषताएं बताई गई हैं।

लग्न में द्रेष्काण उदित होने पर शरीर के अंग

भाव                        प्रथम द्रेष्काण       द्वितीय द्रेष्काण          तृतीय द्रेष्काण

प्रथम                         सिर                             गर्दन                       बस्ति

द्वितीय                    दायीं आंख             दायां कन्धा                    जननांग

तृतीय                      दायां कान              दायीं बाजू                    दायां वृषण

चतुर्थ                      दायीं नासिका       शरीर का दायां हिस्सा         दायीं जांघ

पंचम                      दायां गाल              हृदय का दायां भाग            दायां घुटना

षष्ठम                       दायां जबड़ा           दायां फेफड़ा तथा स्तन      दायीं पिंडली

सप्तम                   मुख                              नाभि                              टांग तथा पैर

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अष्टम                      बायां जबड़ा           बायां फेफड़ा तथा स्तन       बायीं पिंडली

नवम                       बायां गाल              हृदय का बायां भाग             बायां घुटना

दशम                      बायीं नासिका       शरीर का बायां भाग             बायीं जांघ

एकादश                    बायां कान              बायीं बाजू                  बायां वृषण

द्वादश                     बायीं आंख             बायां कंधा                               गुदा

यदि जातक की कुण्डली में पाप ग्रह किसी विशेष द्रेष्काण से उपस्थित हो तो ऐसी स्थिति में पाप ग्रह वहां पर विशेष रूप से घाव या व्रण पैदा कर देते हैं। इसके अलावा पाप ग्रहों के जगह शुभ ग्रह भी उपस्थित हो तो उस स्थिति में भी धब्बा, निशान, तिल या मस्सा पैदा करते हैं। वराहमिहिर कहते हैं कि यदि कोई ग्रह आपको घाव, व्रण या मस्सा दे सकता है तो उसके अपने भाव से ही शनि से युक्त होने पर वह घाव वज्र या मस्सा जन्म से ही जातक को होता है अन्यथा दाग धब्बे वाली यह स्थिति बाद में ही होती है। यदि किसी जातक की कुण्डली में पाप प्रभाव पैदा करने वाला ग्रह चन्द्रमा है तो ऐसे में जातक को घाव किसी जानवर के सींगो से या फिर किसी उत्तेजित करने वाले द्रव पदार्थ से हो सकता है। यदि कुण्डली में पाप प्रभाव मंगल ग्रह के द्वारा हो रहा हो तो ऐसे में जातक को अग्नि, शस्त्र, विष या सर्प के कारण घाव उत्पन्न हो सकता है। बुध ग्रह के कारण कुण्डली में पाप प्रभाव हो तो जातक की अत्यधिक ऊंचाई से गिरने के कारण चोट लग सकती है। यदि सूर्य के कारण कुण्डली में पाप प्रभाव हो तो जानवर या किसी लकड़ी के टुकड़े से चोट लगने से घाव हो सकता है। इसके अलावा यदि शनि ग्रह के कारण कुण्डली में पाप प्रभाव पैदा हो रहा हो तो जातक को पत्थर तथा किसी वायु रोग के कारण घाव हो सकता है।

विशेष

जातक की कुण्डली में यदि चन्द्रमा, अपीड़ित हो तथा बुध, गुरू या शुक्र किसी भी द्रेष्काण में हो तो उस द्रेष्काण के द्वारा प्रदर्शित शारीरिक अंगों पर किसी प्रकार का कोई घाव या निशान नही होता है।