ज्योतिष से जानें जातक पर क्यों बढ़ता है ऋण का प्रभाव

धार्मिक शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि देव ऋण,ऋणि ऋण एवं पितृ ऋण का प्रभाव जन्म-जन्मांतरों तक हमारा पीछा करता है और ऋण में डूबे व्यक्ति के घर-परिवार में कभी भी बरकत नही होती है क्योंकि जहां ऋण रहता है वहां माता लक्ष्मी वास नही करती हैं और यही कारण है कि शास्त्रों में कहा गया है- पितृ देवा भव, आचार्य देवो भव, मातृ देवो भव। पिता से लिया हुआ कर्ज पुत्र को चुकाना पड़ता है। ऐसे में हम सभी को तीन बाते कभी भी नही भूलनी चाहिए। पहला कर्ज, दूूसरा फर्ज एवं तीसरा मर्ज।

विष्णु पुराण के कलयुग वर्णन में स्पष्ट रुप से लिखा गया है कि जब कलयुग आयेगा तो मनुष्य जीवन भर कमायेगा और अपनी सारी पूंजी घर बनाने में लगा देगा जिसका उदाहरण हम होम लोन से समझ सकते है। आपको कई बार होम लोन देने में कठिनाई का सामना करना पड़ता हैं जिसके कारण ऋण चुकाना बहुत कठिन हो जाता है। जो जातक कर्ज , फर्ज एव मर्ज का ध्यान में रखकर कोई काम पूरा करते हैं। उन्हें कभी भी असफलता का सामना नही करना पड़ता है।

महाभारत के अनुसार पांडवों की गलती का परिणाम उनकी पत्नी द्रौपदी को भुगतना पड़ा। इसी अनुसार श्रवण के माता-पिता के श्राप के कारण महाराज दशरथ को अपने संतान के लिए दर-दर ठोकरे खानी पड़ी थीं। पिता के गलती के कारण श्रीराम को 14 वर्षों का वनवास झेलना पड़ा। आदिकवि वाल्मीकि ने चिड़ीमार को शाप दिया था कि तुम्हें और तुम्हारी पूरी जात को कभी भी मान-सम्मान की प्राप्ति नही होगी। इस प्रकार यह कहना गलत नही होगा कि माता-पिता एवं पूर्वजों का ऋण भी हमें ही चुकाना पड़ता है।

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कुण्डली का नवम भाव यह बताता है कि जातक पिछले जन्म के कौन से पुण्य लेकर आया है। यदि भाग्य भाव अर्थात नवम भाव में राहु,बुध या शुक्र हो तो कुण्डली पितृदोष की मानी जाती है। इसके अलावा नवम भाव में बृहस्पति के साथ शुक्र हो, चतुर्थ भाव में शनि के साथ केतु हो एवं चन्द्रमा दशम भाव में विराजमान हो तो जातक पितृ ऋण से परेशान रहेगा।

अन्य कई परिस्थितियों में पितृ दोष का निर्माण

☸ जब तीसरे में बुध एवं नवम में राहु हो।
☸ जब चौथे भाव में बुध और नवम में चन्द्रमा हो।
☸ जब छठवे भाव में बुध और भाग्य भाव में केतु हो।
☸ छठवें या ग्यारहवें में बुध और नौवे भाव में शनि की उपस्थिति हो।
☸ दूसरे अथवा सातवें भाव बुध और नौवें में शुक्र हो।
☸ लग्न से आठवें में बुध और नौवें में बृहस्पति हो।

एक तरफ यह ऋण हमारे पूर्वजों, हमारे कुल, हमारे धर्म, हमारे वंश आदि से जुड़ा है इस ऋण को पृथ्वी का ऋण भी कहते है। जो संतान द्वारा चुकाया जाता है। कई जातक अपने धर्म, मातृभूमि या कुछ को छोड़कर चले गये है। उनके पीछे यह ऋण कई जन्मों तक रहता है। जब कोई जातक अपने धर्म को छोड़कर और कुल को छोड़कर गया हो तो उसके कुल का अंत होने तक यह ऋण दोष रहता है।

देव ऋण

देव ऋण भगवान विष्णु का माना जाता है। यह ऋण यज्ञ करने एवं श्रेष्ठ चरित्र के माध्यम से समाप्त होता है जो जातक धर्म का अपमान करते हैं अथवा धर्म के बारे में अंध विश्वास फैलाते हैं, वेदों के विरुद्ध काम करते हैं उन्हें देव ऋण के प्रभाव का सामना करना पड़ता है।

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देव ऋण उपाय

नियमित रुप से सुबह एवं शाम के समय विष्णु अथवा हनुमान जी के किसी मंत्र या चालीसा का पाठ करें। धर्म का प्रचार एवं प्रसार करें।

ऋषि ऋण

ऋषि ऋण भगवान शिव शंकर से जुड़ा है। वेद, उपनिषद एवं गीता को पढ़ने से इस ऋण से मुक्ति मिलती है जो जातक ऐसा नही करते हैं उनसे देवों के देव महादेव सदैव अप्रसन्न रहते हैं। इस ऋण के प्रभाव से जातक मृत्यु तुल्य कष्ट का सामना करता है और सदैव परेशानियों से घिरा रहता है।

ऋषि ऋण उपाय

कुछ मुख्य दिनों पर ब्राह्मणों को भोजन खिलाएं। सिर पर घी, केसर या चंदन का तिलक लगाना चाहिए एवं सदाचार को अपनाएं। पीपल, बड़ एवं तुलसी के पौधे को जल अर्पित करें।

ब्रह्म ऋण

पितृ ऋण की भाँति ही ब्रह्म ऋण भी होता है। यह वह ऋण है जो हम सभी को ब्रह्मा जी के द्वारा प्राप्त है। हम सभी को ब्रह्मा जी एवं उनके पुत्रों ने बनाया है और जब उन्होंने बनाने में कोई भेदभाव, छुआछुत जाति का विभाजन नहीं किया है तो पृथ्वी पर आने के बाद हमने उनके कुल को जातियों में बाट दिया और अपने ही भाइयों से विभाजित कर दिया। जिसके कारण हम सभी युद्ध, हिंसा और अशांति से आज भी परेशान है।

ब्रह्मऋण उपाय

इस ऋण से मुक्ति पाने के लिए अपने मन से भेद भाव, छुआछुत एवं जाति पात की भावनाओं को दूर रखें क्योंकि हम सभी ब्रह्मा की संतान है।

पितृ ऋण

जब किसी जातक की कुण्डली के पंचम, द्वादश, द्वितीय एवं नवम भाव में कोई भी ग्रह उपस्थित हो तो जातक पितृ ऋण से ग्रसित रहता है। पितृ दोष के कारण आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है।

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पितृऋण उपाय

पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए पितृ पक्ष में तर्पण एवं श्राद्ध करें तथा अपनी संतान को अनुशासित एवं आदर्श बनाएं। अपने कुल परम्परा का पालन करें। पितृ ऋण 28 से 36 वर्ष की आयु में अधिक प्रभावित होता है। घर के वास्तु दोषों को ठीक करने से भी पितृ दोष समाप्त होता है।