तुलसीदास जयंती 2023

तुलसीदास जी की जयंती प्रत्येक वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्षके सप्तमी तिथि को मनाई जाती है। तुलसीदास जी को रामचरितमानस के रचना के लिए भी जाना जाता है। जिनकी चौपाईयों आज भी जीवंत है। तुलसीदास जी ने भगवान शिव के स्तुति के लिए भी अच्छे-अच्छे चौपाईयों का वर्णन किया है। इस प्रकार सावन के महीने में आप तुलसीदास जी के जयंती पर उनके चौपाईयों को सुनकर भगवान भोलेनाथ का स्मरण करके उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और साथ ही तुलसीदास जी से जुड़े कुछ विशेष तथ्यों के बारे में भी जान सकते हैं।

तुलसीदास जी की जीवन कथा संक्षिप्त परिचय

तुलसीदास जी का जन्म संवत 1589 ई में उत्तर प्रदेश के वर्तमान बांदा जिला के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था लेकिन कुछ विद्वानों के मतानुसार उनका जन्म 1554 ई में हुआ था। कुछ लोगों के अनुसार उनका जन्म स्थान सोरों बताया जाता है।

मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म 1532 ई में हुआ था तथा उनका निधन 1623 ई में हो गयी। कहा जाता है कि जन्म लेते ही तुलसीदास जी के मुख से राम का नाम निकला था इसलिए उनका भी राम बोला रखा गया। राजपुर के तथ्यों के अनुसार तुलसीदास जी सरयुपारी ब्राह्मण थें तथा वो गोसाई समाज से संबंध रखते थें। कुछ प्रमाणों के अनुसार उनके पिता का नाम आत्मा राम दूबे बताया जाता है परन्तु भविष्य पुराण में उनके पिता का नाम श्रीधर बताया गया है। उनकी माता का नाम हुलसी बताया जाता है परन्तु उनके जन्म के भाँति ही उनके माता-पिता के बारे में भी कोई ठोस जानकारी नही मिलता है।

भविष्य पुराण के अनुसार उनके गुरु का नाम राघवानंद, विलसन के अनुसार जगन्नाथ तथा सौरों से प्राप्त प्रमाण के अनुसार नरसिंह चैधरी और त्रिपर्सन तथा अंतर्साक्ष्य के अनुसार नरहरि जी थें। कहा जाता है कि तुलसीदास जी का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था और उनके जन्म के उपरांत उनके माता का देहांत हो गया जिसके बाद उन्हें मनहूस समझकर उनके पिता ने उनका त्याग कर दिया। पिता के त्यागनें के बाद एक दूसरे गांव की महिला ने उन्हें पाला परन्तु बाद में उस महिला का भी निधन हो गया है जिससे सम्पूर्ण ग्रामवासी उन्हें मनहूस मानने लगें। बचपन से ही तुलसीदास जी को भिक्षा मांगकर अपना गुजारा करना पड़ा था परन्तु ग्रामवासी उन्हें भिक्षा देने से भी कतराते थें।

मान्यताओं के अनुसार एक बार माता पार्वती को उनके ऊपर दया आ गई और वों स्त्री का भेष धारण करके उनके घर्र आइं और भूखे तुलसीदास जी को भोजन कराया। भगवान शंकर और माता पार्वती जी की कृपा से तुलसीदास जी का जीवन आगे बढ़ा और उन्हें पालक के रुप में नरहरिदास मिले। नरहरिदास जी ने पालन-पोषण किया। साथ-साथ तुलसीदास जी ने काशी में परम विद्वान महात्मा शेष सनातन जी से वेद-वेदांग, इतिहास, दर्शन-शास्त्र और पुराण आदि का ज्ञान भी अर्जित किया।

29 वर्ष की आयु में तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली के साथ हुआ। तुलसीदास जी अपने पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थें जिसके कारण उनकी राम भक्ति लगभग छूट सी गई थी। एक बार उनकी पत्नी मायके में थीं और जब उन्हें पत्नी की याद सताई तो वो बारिश और तूफान से भरी रात में भी अपने सुसराल पहुंच गयें। ये बात उनकी पत्नी को बहुत बुरा लगा उन्होंने कहा- लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ, अस्थि चर्म मद देह यह ता सो ऐसी प्रीति ता। नेकु जो होती राम से तो काहे भव भीत बीता। पत्नी द्वारा यह बात सुनकर तुलसीदास जी को अत्यधिक दुख हुआ और उसके बाद उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन प्रभु श्रीराम के चरणो में समर्पित कर दिया।

अपने जीवनकाल में तुलसीदास जी ने कई स्थलों पर भ्रमण किया और सभी जगहों पर उन्होंने राम जी के महिमा का बखान किया। भगवान शिव और हनुमान जी कृपा से तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की।

मान्यताओं के अनुसार वाराणसी के प्रसिद्ध संकटमोचन मंदिर का निर्माण भी तुलसीदास जी द्वारा किया गया था। कहा तो ऐसा भी जाता है कि इस मंदिर के निर्माण से पूर्व इसी जगह पर हनुमान जी तुलसीदास को दर्शन दिये थें जिसके पश्चात उन्होंने संकटमोचन मंदिर की स्थापना की । भगवान हनुमान के बाद तुलसीदास जी को राम का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है इसलिए मान्यता ऐसी है कि कलयुग के वे एकमात्र ऐसे इंसान थें जिनको हनुमान सहित भगवान राम और लक्ष्मण ने दर्शन दिया था।

रामायण ऋषि वाल्मीकि की रचना है जो कि संस्कृत में है। तुलसीदास जी ने उनके द्वारा रचित रामायण को अवधि भाषा में अनुवाद करके रामचरित मानस का रुप दिया जिसके कारण उन्हें कुछ लोग वाल्मीकि जी का अवतार भी मानते हैं।

रामचरितमानस के अलावा तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा, सतसई, बैख, रामायण, पार्वती मंगल, गीतावली, विनय पत्रिका, वैराग्य संदीपनी, कृष्ण गीतावली आदि ग्रंथों की रचना की है।

तुलसीदास जी ने अपने जीवनकाल में समाज में फैले कुरीतियों के विरुद्ध की आवाज उठाई थी।

अपनी रचनाओं के द्वारा भी उन्होंने कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया था।

तुलसीदास जी के जन्म को लेकर एक दोहा प्रचलित है-

संवत् सोलह सौ असी,असी गंग के वीर।
श्रावण शुक्ल सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।
एक दोहा इनके मृत्यु के संदर्भ में भी है-
पंद्रह सै चौवन विषै, कालिंदी के तीर, सावन शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरेऊ शरीर।

तुलसीदास जयंती का महत्व

उपरोक्त कथनों में भी हमने बताया कि तुलसीदास जी का जन्म श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के सप्तमी तिथि को हुआ था इसी जन्म दिवस को विद्वान जन तुलसीदास जयंती के रुप में मनाते हैं। तुलसीदास जी की जयंती का महत्व मनाने वाले संत तुलसीदास जयंती के दिन उनका स्मरण करते हैं तथा उनका आशीर्वाद लेते हैं। तुलसीदास की सम्पूर्ण जीवन राममय था और तुलसीदास जी एक महान कवि होने के साथ-साथ संत शिरोमणि थें इसलिए धर्म गुरुओं द्वारा राम और भक्तों द्वारा तुलसीदास जी की जयंती मनाई जाती है।

तुलसीदास जयंती के दिन उन्हें याद कर पूजा अर्चना यज्ञ, हवन तथा रामायण का पाठ भी किया जाता है।

तुलसीदास जयंती 2023ः- वर्ष 2023 तुलसीदास जयंती 23 अगस्त दिन बुधवार को पड़ रहा है।

तुलसी दास जयंती पूजा समय

सप्तमी तिथि प्रारम्भः- 23 अगस्त 2023 को प्रातः 03ः05 से
सप्तमी तिथि समापनः- 24 अगस्त 2023 को प्रातः 03ः30 पर