नवरात्रि के अवसर पर माँ दुर्गा चालीसा का हिन्दी अनुवाद

हिन्दू धर्म के अनुसार ऐसा कोई धर्म नहीं है जहाँ पर एक नारी का मान- सम्मान या ईश्वरीय शक्ति के रूप में पूजा-अर्चना की जाती हो। सनातन धर्म के अनुसार माँ आदिशक्ति जिन्हें हम माँ दुर्गा के नाम से जानते हैं वह ईश्वर के लिए की आज भी पूज्यनीय है। पौराणिक कही गई कथाओं के अनुसार प्रभु श्री राम जी जब रावण के साथ अंतिम युद्ध पर जा रहे थे तभी उन्होंने मां दुर्गा का मन ही मन ध्यान किया था। ऐसे में एक सर्वोच्च ईश्वर के द्वारा माँ दुर्गा का ध्यान किये जाने के कारण सनातन धर्म के सभी अनुयायियों के लिए दुर्गा चालीसा का महत्व काफी ज्यादा बढ़ जाता है।

माँ दुर्गा का चालीसा तो आपने अक्सर करके नवरात्रि था मा दुर्गा की पूजा-अर्चना करते समय किया होगा परन्तु आपने चालीसा पढ़ लेने के बाद कभी यह जानने का प्रयास किया की माँ दुर्गा की यह पवित्र चालीसा कहती क्या है? तो आइए दुर्गा चालीसा द्वारा कहे गये शब्दों के एक- एक अनुवाद को विस्तार से समझने का प्रयास करते है।

दुर्गा चालीसा

सम्पूर्ण दुर्गा चालीसा का अनुवाद और उसका भावार्थ।
नमो नमो दुर्गें सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुख हरनी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! जो इस पूरी सृष्टि को सुख प्रदान करती हैं, उन्हें हमारा प्रणाम है, प्रणाम है। हे माँ अम्बे जो इस सृष्टि पर हम सभी के दुखों को हरने वाली हैं उन्हें हमारा प्रणाम है, प्रणाम है।

भावार्थः- माँ दुर्गा के इस चालीसा का यह अर्थ है कि माँ दुर्गा का स्मरण मात्र कर लेने से सभी भक्तों के मन को शांति मिलती है। यदि हमें किसी बात की चिंता लम्बे समय से सता रही है या हमें किसी प्रकार का तनाव हो रहा है तो ऐसे में अच्चे मन से माँ की भाक्त और ध्यान करना चाहिए ऐसा करने से हमारा मन पूरी तरह से शांत हो जाता है तथा हमें आगे का मार्ग साफ-साफ नजर आने लगता है। मां दुर्गा हमें आगे क्या करना चाहिए क्या नही इसके बारे में हमे रास्ता दिखाती है जिससे हमारे जीवन में आये सभी प्रकार के संकट व दुख दर्द समाप्त हो जाते हैं।

निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहुँ लोक फैली उजियारी ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा !! आपकी ज्योति का इस पूरी सृष्टि पर कोई आकार नही है और आपकी यह शक्तिस्वरूप ज्योति ही तीनो लोकों मे फैलकर सभी के अंधकारमय जीवन में प्रकाश दे रही है।

भावार्थः- माँ दुर्गा के चालीसा के इस द्वितीय पंक्ति में यह बताया गया है माँ की इस ज्योति का प्रकाश किसी एक लोक पर न पड़कर तीनो लोकों पर फैल रहा है। फिर चाहे वह स्वर्ग लोक हो, पृथ्वी लोक या पाताल लोक इन तीनों ही लोकों पर माँ की कृपा समान रूप से प्राप्त हो रही है। माँ दुर्गा हम सभी लोगों के जीवन में अंधकार भरे संकट को पूरी तरह से, समाप्त करके उन्हें अपने जीवन में आगे का मार्ग दिखाकर उनके सम्पूर्ण जीवन में प्रकाश फैलाने का काम कर रही हैं।

शशि ललाट सुख महा विशाला । नेत्र लाल मुकुटि विकराला ॥

अनुवादः- हे माँ दुर्गा !! आपके इस स्वरूप में आपका साथा चन्द्रमा के समान बड़ा है और आपका सुह बहुत ही विशाल है इसके अलावा आपकी आँबवे सुर्ख लाल रंग की तथा आपकी भौंहे बहुत ही स्वशा भयंकर तथा भयावह हैं।

भावार्थः- माँ दुर्गा चालीसा के इस तृतीय पक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है की हे माँ आपका स्वरुप बहुत मनोहर होने के साथ-साथ भयावह भी है आपके इस स्वरूप में आपका माथा चन्द्रमा कि भाँति अर्थात शीतल व ठंडा है जिसके कारण माँ अपने हर कार्य को शांत दिमाग में करती है। हे आपकी आँखे एक दमलाल हैं अर्थात् दुष्टों का नाश करने के लिए माँ हमेशा तैयार रहती हैं और उनकी भयानक भौह उन्हीं दुष्टों के लिए हमेशा चढी रहती हैं।

रूप सातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे।।

अनुवादः-हे माँ दुर्गा आपका यह स्वरूप हम सभी भक्तों के मन को मोहित कर देने वाला है कहा जाता है जो भी भक्त आपके दर्शन मात्र कर लेता है उसे अपने जीवन में अपार आनंद की प्राप्ति होती है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस चतुर्थ पांवत में यह बताया गया है कि माँ दुर्गा का यह अत्यन्त सुन्दर रूप हम सभी भक्तो को बराबर रूप से आनंद की प्राप्ति कराने वाला होता है। माँ दुर्गा अपने शीतल और अपने कभी-कभी अपने भयावह रूप में भी अपने सभी भक्तो को आनंद की प्राप्ति कराती है। साथ ही उन्हें अपने जीवन में सुख की प्राप्ति कराती है।

इसके अलावा माँ अपने सभी भक्तों के शत्रुओं का नाश करके अपने भक्तों को अपना आर्शीर्वाद देती है। अर्थात माँ के इन दोनों ही रूपों को देखकर माँ दुर्गा के सभी भक्त उनकी छत्रछाया में अपने आपको हमेशा सुरक्षित महसूस करते हैं।

तुम संसार शक्ति लय कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा !! आपके अन्दर इस पूरे विश्व की सभी शक्तियाँ समाहित है हे माँ दुर्गा आपने ही इस पूरी दृष्टि की देख रेख करने व उनका लालन-पालन करने के लिए अन्न व धन दिया हुआ है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस पंचम पंक्ति के भावार्थ में यह लिखा गया है कि इस सृष्टि में जितने प्रकार की भी बुरी या अच्छी शाक्तयों, ऊर्जा और चेतना विद्यमान है वह सभी माँ के द्वारा ही दी हुई हैं ऐसे में माँ के द्वारा यह शक्तियाँ देने के बावजूद भी किसी प्रकार से ऊर्जा में कमी आ रही हो तो ऐसी स्थिति में सभी भक्तों को अपने माँ का ध्यान सच्चे मन से करना चाहिए ऐसा करने से हमारे शरीर में एक अलग ही ऊर्जा का संचार देखने को मिलता है। आपको बता दें इस पूरी सृष्टि में जितने भी अन्न धन है वह सब माँ की कृपा से ही प्राप्त होती है।

अन्नपूरना हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला।।

अनुवादः- दुर्गा हे माँ दुर्गा आप अन्नपूर्णा का ही एक रूप है जो इस सृष्टि पर उपास्थित होकर अपने सभी भक्तों का पेट भर रही है। आप अपने इस स्वरूप से अपने सभी भक्तो के मन को मोह लेने वाली है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस षष्ठम् पोक्त के भावार्थ में यह लिखा गया है कि माँ अन्नपूर्ण अपने सभी भक्तो को अन्न धन दे रही है। वास्तव में माँ अन्नपूर्णा का स्थान हर घर की रसोई में होता ही है जिसे ग्रहण करने से पहले हम माँ अन्नपूर्णा को श्रद्धा से नमन करते हैं। अतरू इस सृष्टि पर मौ अन्नपूर्णा अपने सभी भक्तों का कल्याण कर रही हैं। आपके जैसी छवि इस में सृष्टि पर कहीं नहीं है।

प्रलय काल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! जब इस सृष्टि पर घोर अपराध बढ़ जाता है तो आप ही प्रलय लाती है और सभी पापीयों का नाश कर देती हैं। हे माँ आप ही माँ पार्वती का वह स्वरूप हैं जो शिव जी को अत्याधिक प्रिय है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस सप्तम् पंक्ति के भावार्थ में यह कहा गया है की माँ इस पूरी सृष्टि के लोगे का कल्याण करने वाली हैं साथ ही घोर अपराध बढ़ जाने के कारण इस पूरी सृष्टि का संहार करने वाली भी है। यूँ कहे तो जो महत्वपूर्ण कार्य भगवान शिव शंकर करते हैं वही काम माँ करती हैं. इस पूरी सृष्टि पर प्रलय जाकर इस सृष्टि का नाश कर देने वाली हैं। इस भावार्थ में शिव जी की पत्नी माँ पार्वती को भी माँ दुर्गा का ही एक स्वरूप बताया गया है।

शिव योगी तुम्हरे गुण गावैं। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावै ॥

अनुवादः- हे माँ दुर्गा । भगवान शिव जी के साथ ब्रह्मा, विष्णु और सारे योगी भी आपका गुणगान करते हैं, तथा आपका ही ध्यान करते रहते हैं।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस अष्टम पांवत के भावार्थ में यह कहा गया है की माँ दुर्गा इस सृष्टि पर सभी जगह व्याप्त है अतः मा दुर्गा के द्वारा ही इस इन सब चीजों का निर्माण किया गया है। इसी कारण माँ दुर्गा की स्तुति त्रिदेव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनो मिलकर करते हैं और साथ मे का ध्यान करते हैं जिसके द्वारा उन्हें कुछ विशेष शक्तियाँ प्राप्त होती हैं और वे इस पूरी सृष्टि का चलाने का कार्य करते हैं।

रूप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा आपने ही अपने दूसरे स्वरूप से माँ सरस्वती का भी रूप लिया है और अपने इस स्वरूप से आकर इस सृष्टि पर स्थित सारे ऋषि-मुनियों सतबुद्धि प्रदान कर उनका हर समय उद्धार किया हुआ है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस में नवम् पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि माँ दुर्गा के इस स्वरूप यानि माँ सरस्वती को इस सृष्टि में बुद्धि विद्या और संगीत की देवी माना जाता है अतरू माँ के इसी स्वरूप के द्वारा ही सभी मनुष्यों व अन्य जीव जन्तुओं की बुद्धि और मस्तिष्क का विकास किया गया है। माँ सरस्वती माँ दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं जिसे माँ दुर्गा ने भगवान ब्रह्मा जी के कहने पर प्रकट किया गया था। जैसे जैसे हम माँ दुर्गा का ध्यान करते हैं वैसे-वैसे ही हमारी बुद्धि का विकास होता है जिससे व्यक्ति अच्छे या बुरे की समझ अच्छे से कर पाता है।

धरा रूप नरासिंह को अम्बा । परगट भई फाड़ कर खम्बा।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! श्री विष्णु जी के भक्त प्रह्लाद को उसके राक्षस प्रपिता हिरण्यकश्यप से बचाने के लिए आपने ही इस नरासंह अवतार लिया था और राजमहल के खम्भे को फाड़कर प्रकट हुई थी।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस दशम् पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि माँ दुर्गा अपने सभी भक्तों की हर परिस्थिति में रक्षा करती हैं। फिर चाहे वह पाताल लोक में राक्षस लोगो के घर ही क्यों न जन्मे हो जिस प्रकार से प्रह्लाद राक्षस राजा हिरण्यकश्यप के यहाँ पुत्र के रूप में जन्मे थे परन्तु वे विष्णु जी के बहुत बड़े भक्त थे। इसी कारण से प्रह्लाद को उनके पिता द्वारा बहुत से शारीरिक और मानसिक कष्ट दिये जाते थे परन्तु उनकी भक्ति और श्रद्धा भगवान विष्णु जी पर अडिग रही । तभी माँ ने अपने भक्त को बचाने के लिए ही हिरण्यकश्यप के राजमहल के खम्भे को फाड़कर प्रकट हुई थी।

रक्षा कर प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आपने ही अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए उस राक्षस राजा हिरण्यकश्यप का वध किया था।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के एकादश पंक्ति के भावार्थ में यह कहा गया है की माँ दुर्गा अपने इस जरासंह अवतार में अत्यन्त ही भयानक लग रही थी जिस स्वरूप को देख सभी राक्षस काँपने लगे थे इसके बाद माँ दुर्गा ने अपने इस रूप में राक्षस हिरण्यकश्यप का वध कर दिया और भक्त प्रह्लाद को वहाँ का राजा घोषित किया। अर्थात् इस आवार्थ के कहने का तात्पर्य यह है कि माँ दुर्गा के भक्त चाहे किसी भी लोक में क्यों न हो यदि हम माँ दुर्गा की सच्चे मन से भक्ति- करते हैं तो माँ हमारी रक्षा करने के लिए अपने किसी भी स्वरूप में प्रकट हो सकती है।

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लक्ष्मी रूप घरो जग माही। श्री नारायण अंग समाही ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा। आपने ही अपने दूसरे स्वरूप में लक्ष्मी जी का भी अवतार लिया हुआ है और प्रभु श्री नाथायण के साथ अपने इस रूप में विराजमान है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस द्वादश पांवत के भावार्थ में यह कहा गया है की है माँ दुर्गा आप ही धन व संपत्ति की देवी माँ लक्ष्मी भी आपका ही स्वरूप है। कहा जाता है कि जो भक्त माँ दुर्गा की सच्चे मन से भक्ति करते हैं । और ईमानदारी से अपना सभी कार्य करते हैं उनके पास कभी भी धुन- सांपत्ति की कोई कमी नही होती है इसलिए माँ दुर्गा के इस स्वरूप को हमे दुर्गा मानकर ही इनका आदर और सम्मान करना चाहिए और कभी भी घर आई हुई लक्ष्मी का कभी दुरुपयोग नही करना चाहिए।

क्षीरसिंधु में करत विलासा। दयासिंधु दीजै मन आसा।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आप अपने लक्ष्मी जी के स्वरूप में भगवान विष्णु जी के साथ क्षीर सागर में विराजित हैं। हे माँ लक्ष्मी आप तो दया की देवी हैं आप मेरी भक्ति से प्रसन्न होकर मेरे मन की इच्छाओं को पूरा कीजिए।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस तेरहवें पांवत के भावार्थ में यह कहा गया है कि हे माँ दुर्गा को स्वरूप माँ लक्ष्मी आप अपने इस रूप से, नारायण के साथ है। क्षीर सागर में रह रही हैं और वहाँ स्थित हरेक भक्तो के मन की इच्छा पूरी कर रही है आपकी कृपा से है हमारी भी सारी इच्छाएं पूरी होती है। यदि आप अपने जीवन में किसी बात का लेकर गित हो या उत्साहित हो तो अवश्य रूप से माँ दुर्गा का ध्यान करके अपने काम में ईमानदारी से लग जाना चाहिए ऐसा करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी और आपके सारे कार्य जल्द से जल्द पूरे हो जायेंगे।

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! पूरे हिंगलाज मे मा भवानी का रूप भी आपका ही रूप हैं आपकी इस सहिमा का बरवान भी कोई नही कर सकता है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस चैदहवे पंक्ति के भावार्थ में यह कहा गया है कि हे सो दुर्गा आपके अनेक रूप होते हैं और उन अनेक रूपों में आपका एक रूप माँ भवानी का भी है जो अपने भक्तों की सारी इच्छाएं पूरी करती हैं। आपको बता दें माँ दुर्गा की गुण और शक्तियाँ इतनी ज्यादा है कि उसका वर्णन कभी शब्दों में नही किया जा सकता है। बाल्के आप जब माँ को देखेंगे तो उनकी शक्ति और गुण का अंदाजा आपको लग जायेगा।

मातंगी धूमावती माता। भुवनेश्वरि बगला सुख दाता।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा । आप ही माँ मातंगी व माँ धूमावती है इसके अलावा, आप ही मा भुवनेश्वरि और माँ बगलामुखी के स्वरूप में आकर हम सभी भक्तों का सुख शांति प्रदान कर रही हैं।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस पंद्रहवें अपक्ति के भावार्थ में यह कहा गया है कि है माँ दुर्गा वर्ष में पड़ने वाले सभी नवरात्रों में भी हम आपके सभी 10 महाविद्याओं की पूजा अर्चना करते है। आपके सभी रूप जातक को अलग अलग फल देने वाले होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मां दुर्गा अपने सभी भक्तों को अलग-अलग फल देने के अनुरूप ही अपना अलग-अलग रूप धारण करती हैं और अपने भक्तो की सभी मनोकामनाएं उसी रूप में आकर ही पूरा करती हैं।

श्री भैरव तारा जग तारिणी। क्षिन्न लाल भवदुख निवारिणी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आप इस सृष्टि पर माँ भैरवी व माँ तारा के रूप में आकर इस पूरी सृष्टि से बुराइयों को दूर करके सारे जगत का उद्धार कर रही है। इसके अलावा छिन्नमस्ता के रूप में माँ दुर्गा आप ही इस सृष्टि से सभी दुःखों को दूर कर रही हैं।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस सोलन सोलहवें पांवत के भावार्थ में यह कहा गया है कि इन 10 महाविद्याओं में से माँ दुर्गा के कुछ ही स्वरूपों का वर्णन किया गया है और उनके कप के अनुसार ही उनकी महत्ता को भी अलग 1 अलग दर्शाया गया है। आपको बता दे नवरात्रि के अवसर पर जब हम माँ के अलग-अलग रूपों को हम पूजते हैं वह सभी रूप अंतिम रूप से जाकर माँ दुर्गा में ही समा जाते हैं। इसलिए मात्र दुर्गा माता के ही पूजा-अर्चना कर लेने से सभी माताओं का आशीर्वाद भी हमें प्राप्त हो जाता है।

केहरि वाहन सोहे भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आपके इस माँ दुर्गा के स्वरूप में आपका वाहन सिंह, (शेर) है जिस पर आप माँ दुर्गा भवानी के रूप में विराजमान हैं। इसके अलावा आपकी सेवा में स्वयं हनुमान जी भी तत्पर रहते हैं।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस सतरहवें पक्ति के आवार्थ में यह बताया गया है कि जिस प्रकार से सभी देवी-देवताओं के अपने-अपने वाहन होते हैं ठीक उसी प्रकार से आपका वाहन सिंह यानि शेर हेर जो कि सभी जानवरों से अत्यधिक शक्ति शाली है ऐसे में माँ को अपने दुष्टों का कभी संहार करना हुआश् ष्तो आपका वाहन स्वयं अकेले भी सभी दुष्टों का संहार करके उन्हें पराजित कर सकता है। इसके अलावा हनुमान जी जो प्रभु श्री राम जी के सेवक हैं वे भी आपकी ही आराधना करते हैं तथा आपको ही सर्वोच्च मानते हैं। यदि आपका कोई भी भक्त किसी संकट में है तो उसके संकटों को पूरी तरह से हरने के लिए भी भगवान हनुमान जी हमेशा तैयार रहते हैं।

कर में खप्पर खड़ग विराजे। जाको देख काल डर भाजै ॥

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आपने अपने इस स्वरूप में अपने हाथों में राक्षसों की खोपड़ियों व खड़ा लिया हुआ है जिसे देखकर स्वयं काल भी भयभीत हो जाते हैं। माँ अपने इस स्वरूप में अत्यन्त ही भयावह हैं।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस अट्ठारहवे पांकी के भावार्थ से यह बताया गया है की माँ अपने इस रूप में दृष्टों का संहार करती हुई प्रतीत हो रही हैं। अपने इस स्वरूप से माँ ने अपने एक हाथ में सभी राक्षसों व सभी दुष्टों का नरमुंड लिया हुआ है। अतरू इन्ही नरमुंडो से माँ सभी राक्षसों का सिर काट देती हैं। यदि कोई शत्रु माँ दुर्गा के भक्तो को कष्ट पहुँचा रहा है तो माँ दुर्गा स्वयं उसका संहार करने इस सृष्टि पर आती हैं। यदि सभी भक्त माँ दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा अर्चना श्रद्धा के साथ करते हैं तो आपके ऊपर आया हुआ बड़े से बड़ा संकट भी टल जाता है।

सोहे अस्त्र और त्रिसूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आपने अपने इस स्वरूप में अपने हाथो में तरह-तरह के अस्त्र और प्रशूल धारण किया हुआ है इसे देखकर सभी दुष्ट राक्षस और शत्रु भयभीत हो जाते हैं।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस उन्नीसवें पक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि माँ दुर्गा ने हर तरह के शत्रुओं और सभी पुष्टों का नाश करने के लिए तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र अपने हाथ में उठाये हुए हैं। माँ ने अपने इस स्वरूप से हमें यह समझाने का प्रयास किया है कि हमे बुराई के आगे कभी भी हार नही मानना चाहिए बाल्के आई हुई विपत्तियों का सामना करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए। यदि हम अपने आने वाले संकटो के सामने बीना डरे खड़े रहेंगें तो आपका वाला आने संकट हमेशा के लिए टल जायेगा।

नगरकोट से तुम्ही विराजत । तिहुँ लोक में डंका बाजत ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा! इस सृष्टि पर पूरे नगर में आपही विराजती हैं साथ ही इस दुनियाँ में जितने भी लोक हैं उन सभी लोकों में आपकी जय-जयकार होती है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस बीसवे पक्ति के भावार्थ में यह बताया गया. है कि इस सृष्टि पर उपास्थित सभी चीजों और कण-कण में माँ दुर्गा का वास होता है। यदि आप अपने जीवन मे कोई गलत कार्य छुपाकर कर रहे हैं और अपने मन ही मन यह सोच रहे है कि आप बच गये हैं तो आप बिल्कुल गलत सोच रहे हैं। क्योंकि इस सृष्टि पर ऐसा कोई स्थान नही है जहाँ से आप बच सके, माँ दुर्गा की नजर से आप कभी बच नही सकते हैं। इसलिए चारो तरफ माँ दुर्गा की जय-जयकार की जाती है। यदि इस सृष्टि पर रहकर आपने कोई बुरे कर्म किये है तो हमे हमारे पुरे कर्मों का फल मा दुगी समय आने पर अवश्य देंगी।

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आपने ही इस सृष्टि पर से शुम्भ और निशुम्भ नामक दुष्ट राक्षसों का वध किया। आपके माँ दुर्गा के ही अवतार ने ही रक्त बीज नामक भयानक राक्षस का वध किया था इसके अलावा शंख राक्षस बन जैसे दुष्ट राक्षस का वध भी आपने ही किया था।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस इक्कीसवें पक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि हे माँ आपने ही इस सभी दुष्टांे और रक्त दानवों का वध किया है चाहे वह शुभ और निशुम्भ जैसे दुष्ट राक्षस हो या फिर सबसे खतरनाक और शक्तिशाली राक्षस रक्त बीज हो जिसके रक्त की बूदें धरती पर गिरने से हमसे स्वत उतने ही रक्तबीज और पैदा हो जाते थे। इस राक्षसों का नाश करने के लिए ही आपने काली का रूप धारण कर उस दुष्ट राक्षस रक्तबीज का सारा रक्त पी लिया। इस अर्थ पंक्ति में यह बताया गया है कि माँ अपने दुष्टों का अंत करने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है हैं और अपना कई स्वरूप बदल सकती है। इसमे माँ अपने सभी भक्तों को कठिन से कठिन परिस्थितियों से भी अडिग रहना सीखाती हैं।

महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी।।

अनुवादः- एक समय ऐसा था जब पूरी सृष्टि पर स्थित सभी लोग महिषासुर नामक राक्षस के आतंक से भयभीत थे और तीनो लोकों पर इसका आतंक फैला हुआ था। इसी राक्षस के पापो के भार मे पूरी सृष्टि व्याकुल हो उठी थी।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस बाइसवें पोक्त के भावार्थ में यह बताया गया है कि सृष्टि के तीनो लोकों में जब महिषासुर नामक राक्षस का आतंक पूरी तरह से फैल गया था और धरती पर रहने वाले सभी धरतीवासी इस राक्षस के अत्याचार से परेशान थे और हर जगह त्राहिमाम सच गया और हमारे त्रिदेवयानि ब्रह्मा, विष्णु और महेष भी इसका हल नहीं ढूंढ पा रहे थे तो, हे माँ दुर्गा आपने ही अपनी कृपा से सभी धरती वासियों का उद्धार किया था और उन्हें इस दुष्ट राक्षस से बचाया था।

रूप कराल काली को धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा।।

अनुवादः- महिषासुर जैसे दुष्ट राक्षस का वध करने हे माँ दुर्गा आपने ही माँ काली का भीषण रूप धरा और अपने इस रूप में आकर उस राक्षस सहित पूरी सेना के साथ भयंकर युद्ध करके उसकी सेना का भी विनाश कर दिया।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस तेइसवें पोक्त के भावार्थ में यह बताया गया है कि माँ दुर्गा इस सृष्टि से दुष्ट राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए माँ काली का रूप धारण किया था और अकेले ही उस पूरी सेना से भिड़ गई थीं माँ दुर्गा और दुष्ट राक्षस के बीच यह युद्ध पूरे 9 दिनों तक चला। इस तरह के कई शक्तिशाली राक्षसों का वध करके अंत में महिषासुर का भी वध किया और इस धरती से पाप का असदैव के लिए अंत करके धर्म की पुनः स्थापना की। इसलिए माँ दुर्गा की हमें श्रद्धा से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। माँ दुर्गा हमेशा हमारे साथ रहकर हमारी रक्षा करती हैं।

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परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब तक।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा। इस सृष्टि में जब कभी भी आपके भक्तों पर किसी प्रकार की बड़ी संकट, विपदा या बाधाएं आयी है माँ दुर्गा ने उस समय सबको आश्रय दिया है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस चैबीसवें पांवत के भावार्थ में यह बताया गया है की जब-जब मां के भक्तो पर किसी भी प्रकार का संकत हो या आया है तब-तब माँ ने बिना किसी देरी के अपने सभी भक्तो की समय पर सहायता की है ऐसे में हमारा भी यह फर्ज बनता है कि हमें भी अपने जीवन में आई हुई विपालियों से कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए बल्कि उसका सामना हमें इटकर करना चाहिए चाहे वह संकट बड़ा होता हो। यदि हम अपनी विपालियों को दूर करने के लिए धैर्य के साथ काम लेंगे तो अंत मे विजय हमारी ही होगी।

अमर पुरी औरों सब लोका। तब महिमा सब रहे अशोका ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! इस पूरी सृप्ति में जितने भी लोक है उन सभी लोकों के दुःख और संकट आपकी कृपा मात्र से ही समाप्त हो जाते हैं जिसके कारण आपकी महिमा सम्पूर्ण लोको में फैली हुई है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस पच्चीसवें पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है की इस पृथ्वी पर उपस्थित सभी लोकों से आपकी महिमा पूर्ण रूप से फैली हुई है। इस पंक्ति के अनुसार यह बताने का प्रयास किया गया है की यदि स्वर्गलोक में देवता बुरे कर्म करे और पाताल लोक- में राक्षस यदि पुण्य कर्म करे तो सच्चाई के साथ आप ही इनका फल भी निर्धारित करेंगी। इसी प्रकार से माँ अपने भक्तो की रक्षा सभी को लोकों में करती है और उसके अच्छे और बुरे कर्म के अनुसार उन्हें फल भी देती हैं।

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजे नर नारी ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आपके अनेक स्वरूपों में से एक स्वरूप ज्वाला में ज्वाला देवी नाम से है वहाँ पर आपके नाम की ज्योति दिन रात जल रही है। हे माँ आपको इस सृष्टि पर सभी नर-नारी पूजते हैं।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस छब्बीसवें पांकी के भावार्थ में यह बताया छाया है कि ज्याला माता में आपका जो मंदिर है और वहाँ पर जो ज्योति सदियों से जल रही है वह नाहि किसी घी, ना तेल और नाहि कमी अन्य पदार्थों से जल रही हैं। वास्तव में माँ दुर्गा यह आपकी ही महिमा है जो आविश्वसनीय है। इस ज्योति को मात्र देख लेने से ही सृष्टि पर उपास्थित सभी लोगो को आपकी महिमा का पता चल पाता है और फिर सदियों तक मनुष्य आपकी भक्ति में लीन रहता है। हे माँ इस ज्योति दृश्य, को देखने के बाद आप अग्नि का भी एक स्वरुप है या फिर अग्नि में ही विराजमान है ।

प्रेम भक्ति से जो जस गावै । दुःख दारिद्र निकट नहीं आवे ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! जो भी भक्त पूरे भक्ति भाव से इस दुर्गा चालीसा का पाठ करता है उस जातक को दुःख दरिद्रता तथा आर्थिक संकटों का सामना नही करना पड़ता है। वह व्यक्ति उन तमाम संकटों से दूर रहता है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस सत्ताइसवें पंक्ति के भावार्थ से यह स्पष्ट रूप से बताया गया है कि यदि आप माँ दुर्गा की भक्ति पूरी श्रद्धा से कर रहे हैं तो उसे अपने जीवन में कभी भी माँ दुर्गा की कृपा से कोई कष्ट झेलना,, नही पड़ेगा और नाहि आपको किसी चीज की कोई कमी होगी। इसके अलावा यदि कोई जातक माँ दुर्गा की भक्ति मन में कटुता था ईष्र्या इत्यादि रखकर कर रहा है तो जातक का पूरे जीवन कभी उद्धार नहीं हो सकता है।

हयावें तुम्हें जो तर मन लाई। जन्म मरण ताको छुट जाई ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! जो कोई भी जातक आपकी पूरे सच्चे मन से आराधना करता है उस जातक को अपने जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। और उसे मोक्ष प्राप्ति करने का अवसर प्राप्त होता है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के अट्ठाइसवें पक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि जो मनुष्य सच्चे मन से आपकी आराधना और आपका ध्यान करता है साथ ही अपने मन को पवित्र कर लेता है, किसी दूसरे का कभी करता है, अपने किये गये पुण्य कर्मों से पुण्य कमाता है ऐसे बुरा नही मनुष्य के अन्दर से धीरे-धीरे सभी बुरे पाप और नकारात्मक विचार समाप्त हो जाते हैं इसी तरह से जातक अपने पुण्य कर्मों से जीवन और मरण के सभी बंधनों से है। मुक्त हो जाते हैं मौर माँ की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा इस ब्रह्माण्ड में स्थित सभी देवी-देवता और ऋषि-मुनि कहते हैं सभी एक साथ मिलकर कहते हैं, हे माँ आपकी शक्ति के बिना तो कोई भी योग संभव नहीं है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के उन्तीसवें पोक्त के भावार्थ में यह कहा गया है कि योग एक कैसी साधना है जिसे सनातन धर्म में एक प्रमुख स्थान दिया है गया है। हे माँ वह योग जिसके बल पर हम अपने तन और मन को पूरी तरह से संतुलित कर सकते हैं और इस योग के माध्यम से ही ईश्वर तक को पा सकते हैं वह बिना आपकी आज्ञा के संभव नहीं, हो सकता है। हे माँ इस योग को करने की जो शक्ति है वह भी हमे माँ आपकी ही कृपा से प्राप्त होती है जिसके कारण हम योग कर पाते है।

शंकर आचारज तप कीनों। काम क्रोध जीति सब लीनो ।।

अनुवादः- एक बार पर्तमान में पूजे जाने वाले शंकाराचार्य ने कठिन से कठिन तपस्या करके ही उन्होंने काम और क्रोध इन सभी भावनाओं पर विजयः प्राप्त कर लिया था।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस तीसवे पक्ति के भावार्थ में यह बताया गया हैं कि बहुत समय पहले इस सृष्टि पर आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था जिन्होंने भारत के चारों भागों में चार मठों की स्थापना की थी इसके अलावा उन्होंने उस समय अपने पास कुछ शक्तियों प्राप्त करने और अपने अन्दर की भावनाओं पर नियन्त्रण रखने के लिए ही भगवान शिव जी की सह सच्चे मन से कठोर तपस्या की थी। और इस तपस्या को करने के बाद ही अपनी काम, क्रोध, ईष्या तथा लोभ (लालच ) की भावनाओं पर नियन्त्रण किया था जिसमे उन्हें सफलता मिली थी।

निशि दिन ध्यान धरो यांकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा । तपस्या करते समय शंकराचार्य दिन रात केवल भगवान शिव शंकर के नाम का ही ध्यान किया परन्तु वह उस समय आपका नाम लेना भूल गये।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस एकतीसवें पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि शंकराचार्य ने दिन और रात भगवान शिव जी के नाम का ही जप किया और इन्ही शक्तियों में से दूसरे स्वरूप यानि माँ दुर्गा का नाम लेना ही भूल गये। इस भावार्थ के कहेनुसार इन्होंने पूरी शक्ति से से आधे रूप की पूजा की और बाकी आधे रूप में माँ दुर्गा का पूजन करना वे भूल गये।

शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछतायो ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! शंकराचार्य को आपकी शाक्त का अंदाजा नहीं था जिसे भूल जाने और उनकी पूजा न कर पाने के कारण इतने वर्षों की कठिन तपस्या के बाद उनकी सम्पूर्ण शक्ति पुनः चली गई, जिसे देख उन्हें बहुत पछतावा हुआ।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के बत्तीसवें पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि तपस्या करते समय उन्हें इस बात का अहसास बिल्कुल भी नही था कि यदि किसी मनुष्य. को अपनी भावनाओं पर विजय प्राप्त करनी है साथ ही अपने जीवन में मोक्ष प्राप्त करना है तो माँ दुर्गा के शाक्त रूप की पूजा करना अत्यन्त आवश्यक होता है। अपने किसी भी तपस्या में शिव के गुणों को ले लेना और माँ दुर्गा के शान्ति स्वरूप की अवहेलना करना अच्छा नहीं है इसी कारण शंकराचार्य में है जो कुछ तपस्या करके पाया था उसका वे उचित इस्तेमाल नहीं कर पाये जिसका उन्हें बाद में बहुत पछतावा हुआ।

शरणागत हुई कीर्ति बरवानी। जै जै जै जगवस्त्र भवानी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! तब भगवान शंकराचार्य आपकी शरण में आये और आपके कीर्ति का खूब बखान किया इसके अलावा आपके दरबार में आकर भी उन्होंने माँ दुर्गा की जय-जयकार की और उनकी शक्ति को पहचाना।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस तैंतीसवे पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि शंकराचार्य को जब यह बात पता चली की वे क्या भूल गये थे तभी वे आपकी शरण में आये और माँ दुर्गा की भक्ति करना शुरू किया। उनकी है शक्ति का अहसास हो जाने के कारण शंकराचार्य ने शिव जी के साथ-साथ शक्ति की भी पूजा की और माँ दुर्गा के नाम का जयकारा लगाने लगे।

भई प्रसन्न अदि जगदम्बा । दई शक्ति नहीं कीन विलम्बा।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा । आप शंकराचार्य के किये गये इस कृत्य से प्रसन्न हो गई और आपने उन्हें उनके द्वारा कि गई तपस्या के सभी शक्तियों को वापस भी कर दिया।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस चैंतीसवे पक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि इतना सब हो जाने के बाद अब आदि शंकराचार्य शिव और शक्ति दोनो की ही एक साथ पूजा-अर्चना करने लगे थे जिसके कारण कुछ समय पश्चात् उन्हें सारी शक्तियाँ धीरे-धीरे प्राप्त हो गई और वे अपनी शक्तियों का उचित उपयोग कर पूरे विश्व को यह संदेश दिया।

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा । मेरे जीवन में बहुत ही ज्यादा संकट है जिस संकट ने मुझे चारों ओर से घेर रखा है है माँ आप ही मेरे सभी दुःखों को दूर किजीए आपके सिवा और कौन है मेरा।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस पैंतीसवे पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि जब हम कभी अपने जीवन में चारों ओर से माए हुए संकट से घिर जाते हैं और हमे उससे निकलने का कोई मार्ग समझ में नही आता तो ऐसी स्थिति में घबराने के बजाए हिम्मत से काम लेना चाहिए और यदि आयी हुई इन सारी परेशानियो का सामना कर पाने की हिम्मत हमारे और अन्दर नही है तो उन सबसे पीछे हटने के बजाए माँ दुर्गा का ध्यान करना चाहिए जिससे हमारे मन में एक अलग सी शक्ति का संचार हो और आप उन आयी हुई सभी संकटों का सामना हिम्मत से कर सके।

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आशा तृष्णा निपट सतावै। रिपु सूरख मोहि अति डर पावै ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! एक मनुष्य अपने संकटों से घिरे होकर अपने कर्मी को ठीक से नहीं कर पाता तब वह कहता है कि हे माँ माशा और तृष्णा मुझे हर समय सताती है और मैं तो एक मूर्ख व्यक्ति हूँ जो मोह के आगे हमेशा हार जाता हूँ।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस छत्तीसवें पांक्त के भावार्थ में मनुष्यों की ऐसी भावनामों के बारे में बताया गया है जिससे वह व्यक्ति हमेशा घिरा रहता है और इसी कारण से वह अपने द्वारा किये गये कर्मों पर ज्यादा ध्यान नही दे पाता है। अपनी इन भावनाओं में वह व्यक्ति किसी चीज को पाने की इच्छा, मोह, सम्मान इत्यादि भावनाओं को पाने की होड़ में उसके पीछे-पीछे भागता रहता है और प्राप्त न हो पाने के कारण वह हमेशा दुःखी रहता हैं। कुल मिला-जुलाकर कुछ पाने की चाह उन्हें बहुत होती है।

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकाचीत तुम्हे भवानी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! अब आप ही मेरे शत्रुओं का नाश कीजिए, मैं आपके इस भवानी स्वरुप का ध्यान हर समय करता रहूंगा।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस सैंतीसवे पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि अपने शत्रुओं का नाश करने तथा, अपनी इन भावनाओं पर नियन्त्रण रखने के लिए हर समय मॉ का ध्यान और श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करना चाहिए तथा मां की भक्ति में ही अपनी पूरा मन लगाना चाहिए। यदि आप माँ दुर्गा की भक्ति और पूजा करते समय नित्य उनका पाठ करते हैं तो आपकी अनचाही भावनाएं कम होने लगेंगी और माँ का आशीर्वाद आप पर सदैव बना रहेगा।

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! आप अपने इस भक्त पर अपनी कृपा कीजिए और मुझे ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करके माँ मेरा भी इस सृष्टि पर उदार कीजिए।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के इस अड़तीसवे पंक्ति के भावार्थ में यह बताया गया है कि मनुष्य माँ दुर्गा से यह प्राथना करते हैं कि हे माँ मुझे अपनी कृपा से ऋद्धि-सिद्धि प्रदान कीजिए, हे माँ हमारे अन्दर ज्ञान बुद्धि का भरपूर विकास हो अर्थात हमारे जीवन का उद्धार हमारे ज्ञान से ही संभव है क्योंकि आपकी कृपा और बिना किसी बुद्धि के हम कुछ भी नहीं है माँ इसलिए हमें सतबुद्धि दीजिए।

जब लगि जियौ दया फल पाऊँ। तुम्हरो जस मैं सदा सुनाऊँ ।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा ! मैं अपने इस मिले हुए जीवन मे जब तक जीवित हूँ तब तक आपकी कृपा और दया का पात्र बना रहूँगा। हे माँ मैं अपने जीवन के अंत समय तक आपके शक्तिशाली स्वरुप और यश के बारे में दूसरे लोगांे को बताता रहूँगा और आपकी जय जयकार करता रहूँगा।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के उनतालीसवें पांति के भावार्थ मे यह बताया गया है कि हे मनुष्य तुम इस सृष्टि पर उपस्थित होकर जब कभी भी अच्छे कर्म करेंगे तो आपको माँ की कृपा दृष्टि हमेशा मिलती रहेगी परन्तु जब आप पुरे कर्मों को करने के आदि हो जायेंगे तो मां दुर्गा आपसे सदैव के लिए रुष्ट होकर किये गये पुरे कर्मों का उचित दण्ड देती है। इसलिए माँ की सच्चे मन से भक्ति और कृपा है दृष्टि प्राप्त करने के लिए आपको हमेशा ही अच्छे कर्म करते रहना चाहिए।

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परम पद पावै।।

अनुवादः- जो कोई मनुष्य इस दुर्गा चालीसा का पाठ श्रद्धा पूर्वक करता है उस मनुष्य या स्त्री जातक को सभी तरह के सुख, संपाल, यश तथा वैभव इन सभी की प्राप्ति होती है। जिससे जातक का जीवन धन्य हो जाता है।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के चालीसवें पोक्त के भावार्थ में यह बताया गया है की माँ दुर्गा के जो भक्त पूरे सच्चे मन और अदा से माँ का ध्यान कर दुर्गा चालीसा का पाठ करता है तो ऐसा करने से उसके सन को एक अलग शांति मिलती है तथा । वह व्यक्ति माँ की कृपा से एकदम निर्मल हो जाता है। माँ अपनी कृपा दृष्टि से अपने सभी भक्तों सुख-समृद्धि प्राप्त कराती है जिससे उनके सभी काम धीरे-धीरे बनने लगते हैं।

देेिवदास धारण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी।।

अनुवादः- हे माँ दुर्गा आपका यह भक्त की देवीदास आपकी शरण में रू श्रद्धा से आया है आप अपने इस भक्त पर कृपा कीजिए और इस पूरे जगत का उद्धार कर हमे अपना आशीर्वाद दीजिए।

भावार्थः- दुर्गा चालीसा के एकतालीसवे पावत में इस दुर्गा चालीसा को लिखने वाले स्वयं देवीदास ने कहा है कि माँ मैं आपकी शरण में आया हूँ आपके हाथों ही मेरा उद्धार संभव है। मेरे साथ-साथ माँ आप पूरे विश्व पर भी कृपा दृष्टि बनाए रहिए और सबका कल्याण कीजिए।

माँ दुर्गा चालीसा पढने के नियम

☸ नवरात्रि के शुभ अवसर पर माँ दुर्गा चालीसा का पाठ कोई भी जातक पूरी श्रद्धा से 1 कर सकता है इसके लिए सां की ओर से किसी तरह की मनाही ष् नही होती है। परन्तु इस चालीसा को पढ़ने के लिए हिन्दू धर्म में कुछ नियम बनाये गये हैं जिसे यदि आपने भली-भांति धारण करके उस नियम का पालन नहीं किया तो आपको माँ के शुभ फलों की प्राप्ति नही होती है।

☸ नवरात्रि के व्रत के शुभ अवसर पर यदि आप बिना नहाये या जहाने के बाद यदि शौचालय गए हैं तो भूलकर भी माँ दुर्गा चालीसा का पाठ करने से बचना चाहिए।

☸ दुर्गा चालीसा का पाठ शुरू करने से पहले अपने मन को एकदम शांत रखें और अपने मन में बुरे या नकारात्मक ख्यालों को आने देने से बचे।

☸ माँ का पाठ हमेशा साफ-सुथरे जगह पर ही करें, यदि जगह गंदगी वाला हो या अनुचित हो तो वहाँ पर माँ दुर्गा चालीसा का पाठ करने से बचना चाहिए।

☸ जब कभी माँ दुर्गा का चालीसा पढ़ना शुरू करे उस समय आपका तन और मन साफ सुथरा और निर्मल होना चाहिए।

☸ यदि आप माँ की चालीसा का पाठ बिना इन नियमों का पालन किये बिना भी कर रहे है तो आपको इससे किसी प्रकार की हानि तो नही होगी, परन्तु आपको, आपके द्वारा किये गये इस पूजा का लाभ नही मिलेगा।

☸ इसलिए माँ की पूजा विधि और नियम के अनुसार करने से आपको इसके पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।

माँ दुर्गा चालीसा का महत्व

सनातन धर्म के अनुसार माँ दुर्गा चालीसा के महत्वों की बात करे तो इसके अनुसार माँ दुर्गा के तरह -तरह के रूपों के बारे में भी बताया गया है। सा द्य दुर्गा को ही मा पार्वती, माँ लक्ष्मी और मां सरस्वती का स्वरूप माना गया है। मान्यता के अनुसार मा आदिशक्ति इन तीनों ही देवियों के से प्रकट स्वरूप हुई है तथा इन्हीं देवियों का आधार मानी गई है। वास्तव में माँ दुर्गा चालीसा के माध्यम से हमे यह बताने का प्रयास किया गया है कि माँ आदिशक्ति जैसा इस दुनिया में कोई नहीं है। इसके अलावा जो भक्त माँ आदिशक्ति के इस दुर्गा चालीसा का पाठ करता है इस सृष्टि पर उसका उद्धार होना तय होता है और इन्हीं उद्धारों के द्वारा ही व्यक्ति अपने जीवन में सफलता कर प्राप्त कर सकता है। दरअसल माँ दुर्गा चालीसा के इस पवित्र पाठ के माध्यम से माँ के शक्तिशाली गुणों, शाक्तयों, कर्मों, पराक्रम तथा महत्वों इत्यादि के बारे में विस्तार से बताने का प्रयास किया गया है ताकि माँ दुर्गा के सभी भक्त माँ की शक्ति के बारे में अच्छे से जान लें। और माँ की भक्ति और आराधना करने में कोई गलती न करें।

माँ दुर्गा चालीसा पढ़ने से मिलने वाले लाभ

☸ चैत्र नवरात्रि हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है नवरात्रि में सभी भक्त माँ दुर्गा के सभी स्वरूपों की पूजा करके माँ को प्रसन्न करते हैं और माँ दुर्गा के लिए पूरे 9 दिनों का उपवास रखते हैं। साँ दुर्गा की चालीसा के बिना माँ दुर्गा की पूजा अधूरी मानी जाती है। कहा जाता है कि शत्रुओं से मुक्ति और अपनी सारी इच्छाये पूरी करने के साथ माँ दुर्गा अपने सभी भक्तो की सारी मुरादें पूरी करती है। इसलिए नवरात्रि के शुभ अवसर पर सभी व्रत रहने वाले जातकों को दुर्गा चालीसा का पाठ अवश्य करवाना चाहिए। सभी भक्तों के द्वारा माँ दुर्गा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को एक नहीं बल्कि कई तरह का लाभ मिल सकता है तो आइए इस चालीसा से मिलने वाले अन्य लाभों को जानते है।

☸ माँ दुर्गा चालीसा का पवित्र पाठ करने से माँ के सभी भक्तों को आध्यात्मिक, भौतिक और भावनात्मक सुख की प्राप्ति होती है।

☸ व्रत के दौरान रोजाना दुर्गा चालीसा का पाठ करने से सभी भक्तों को एक अलग ? ही शांति का अनुभव प्राप्त होता है। इस पवित्र चालीसा का पाठ सनातन धर्म में स्थित सभी ऋषि सुनि भी करते थे और अपने मन को बिना। किसी चिंता के पूरी तरह से शांत रखते थे ।

☸ यदि आप अपने शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बनाये रखना चाहते हैं । साथ ही अपने दुश्मनों को हराने की क्षमता विकसित करना चाहते हैं तो ऐसे में आप दुर्गा चालीसा का पाठ विधिपूर्वक कर सकते हैं।

☸ अपने परिवार में आम आये हुए संकट और अशयम आर्थिक स्थिति से छुटकारा दो पाकर अपने दुखों को दूर करना चाहते हैं तो दुर्गा चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए इसके अलावा मानसिक स्थिति में सुधार लाकर विकसित करने के लिए भी माँ के दुर्गा चालीसा का पाठ कर सकते हैं।

☸ यदि आपकी सामाजिक स्थिति खराब हो गई है साथ ही मन से नकारात्मक विचार आना शुरू हो रहा है तो इस चालीसा का पाठ करने से जातक की सारी बुरी परिस्थितियाँ दूर हो जाती है।

☸ माँ दुर्गा के पवित्र चालीसा का पाठ करने से माँ दुर्गा हमें धन, ज्ञान और समृद्धि का वरदान देती है।
☸ यदि आपको अपने जीवन में आगे का मार्ग कुछ समझ नहीं आ रहा है। और आगे उन्हें अपने जीवन में क्या करना है क्या नही करना इस बात को लेकर बहुत चिंतित हैं तो माँ दुर्गा चालीसा का पाठ करने से माँ आपके एक नया रास्ता दिखाती है । जिससे आप अपने जीवन में आगे बढ़ते जाते हैं।

☸ यदि आपको कोई काम लम्बे समय से नही बन पा रहा है और आपके उस काम में किसी तरह की रुकावटें और अड़चने आ रही है तो इस चालीसा का पाठ पढ़ने से आपके काम जल्दी बनने लगते हैं।

☸ यदि आपके घर में नकारात्मकता आ गई है या फिर आपके ऊपर किसी बुरी शक्तियों का प्रभाव है तो यह अभी बुरे प्रभाव माँ दुर्गा चालीसा के प्रभाव से जल्द ही समाप्त हो जाते हैं। इस तरह की स्थिति में माँ दुर्गा चालीसा का पाठ कुछ ही दिनों में अपना असर दिखाने लगता है।