नीचभंग राजयोग

नीचभंग राजयोग को एक प्रबल योग माना जाता है जो जातकों को कई विपरीत परिस्थितियों से बाहर निकालता है। जिन जातकों की कुण्डली में इस योग का निर्माण होता है उनको धन-सम्पत्ति के क्षेत्र में विशेष लाभ प्राप्त होता है कई बार ऐसा होता है कि कुण्डली में ग्रहों की नीच अवस्था को देखकर हम तुरन्त ही चिंतित हो जाते है परन्तु जब तक कुण्डली का पूर्ण विश्लेषण न हो हमें चिंतित होने की आवश्यकता नही है क्योंकि ग्रहों का नीच भंग होता है जिसमे अशुभ परिणाम शुभ परिणामों में बदल जाते है तो आइयें हम ज्योतिषाचार्य के. एम. सिन्हा जी द्वारा नीचभंग राजयोग को समझते है –

कुण्डली में नीचभंग राजयोग का निर्माणः-

कुण्डली में नीचभंग राजयोग का निर्माण तब होता है जब नीच ग्रह इस प्रकार से स्थित हो कि उनकी नीचता भंग हो जाए। नीच भंग होने के कारण यह उत्तम फलदायी हो जाते है। जिसके फलस्वरुप यह नीचभंग राजयोग कहलाता है।

ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों की कुछ प्रमुख अवस्थाएं जैसे उच्च राशि, मूल त्रिकोण राशि, स्वराशि, मित्र राशि, शत्रु राशि, सम राशि एवं नीच राशि होता है तथा सभी ग्रहों के लिए यह राशियां भिन्न-भिन्न होती है। भिन्न-भिन्न राशियों के अनुसार इनके प्रभाव भी भिन्न होते है। जैसे यदि कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में हो तो अत्यन्त शुभ फल देगा तथा मूल त्रिकोण राशि में हो तो उससे थोड़ा कम शुभ फल देगा एवं स्वराशि मे मूल त्रिकोण राशि से थोडा कम तथा नीच राशि में अशुभ परिणाम देगा। इसलिए पहले हम ग्रहों की उच्च एवं नीच अवस्थाओं को जान लेते है जो इस प्रकार है।

उच्च एवं नीच राशिः-

ग्रहों की उच्च राशि वह होती है जहां यह उच्च बिन्दु पर उपस्थित होकर जातकों को सर्वाधिक रुप से प्रभावित करते है। इसके विपरीत ग्रह की नीच अवस्था वह है जिस बिन्दु पर ग्रह जातकों को सबसे कम प्रभावित करते है। एक ग्रह प्रथम राशि में जितने भोगांश पर परम उच्च अवस्था में हो तो उसके ठीक सप्तम भाव नीच का माना जाता है। जैसेः- मेष राशि में सूर्य उच्च का होता है तो सप्तम भाव में अर्थात तुला राशि में सूर्य परम नीच का होगा।

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                                              ग्रहों के उच्च एवं नीच राशि का क्रम

ग्रह                               उच्च राशि                                नीच राशि
सूर्य                                  मेष                                            तुला
चन्द्रमा                             वृषभ                                         वृश्चिक
मंगल                               मकर                                          कर्क
बुध                                  कन्या                                          मीन
बृहस्पति                           कर्क                                          मकर
शुक्र                                 मीन                                           कन्या
शनि                                 तुला                                            मेष

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उपरोक्त सारणी में गहों की उच्च एवं नीच अवस्था दी गई है। नीचभंग राजयोग होने के लिए ग्रहों व ग्रह की नीच राशि में उपस्थित होना अति आवश्यक होता है क्योंकि ग्रह जब तक नीच राशि में नही होगा तब तक उसकी नीचता भंग नही होगी।

नीचभंग निर्माण के कुछ महत्वपूर्ण नियमः-

☸किसी भी ग्रह का नीच राशि मे सदैव भंग नही होता है। इसके लिए कुछ नियम होते है जिनकी उपस्थिति में ग्रहों की नीचता भंग होती है।
☸यदि किसी जातक की कुण्डली में कोई ग्रह अपनी नीच राशि में उपस्थित हो और उस भाव का स्वामी चन्द्रमा द्वारा अधिष्ठित राशि से केन्द्र भाव में उपस्थित हो तो नीचभंग राजयोग का निर्माण होता है। फलस्वरुप अच्छा परिणाम देगा।
☸यदि किसी जातक की कुण्डली में कोई ग्रह नीच राशि में हो लेकिन उस ग्रह का स्वामी ग्रह, कुण्डली के लग्न से केन्द भाव में अर्थात प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम भाव में उपस्थित हो तो नीच भंग राजयोग बनता है।
☸यदि कोई ग्रह अपनी नीच राशि में स्थित हो और उस नीच राशि का स्वामी उच्च भाव के लग्न से केन्द्र भाव में स्थित हो तो भी नीचभंग राजयोग का निर्माण होता है। एक अन्य नियम के अनुसार जब कोई ग्रह अपनी नीच राशि में स्थित हो और उस राशि का स्वामी अपनी उच्च राशि को देख रहा हो तब नीचभंग राजयोग का निर्माण होता है।
☸यदि कोई ग्रह नीच अवस्था में स्थित हो और उस नीच राशि में जो ग्रह उच्च अवस्था में माना जाता हो और वे दोनो ग्रह एक दूसरे से केन्द्र में हो तो नीचभंग राजयोग का निर्माण होता है।
☸वैदिक ज्योतिष शास्त्र में जन्म कुण्डली के साथ-साथ नवमांश कुण्डली को भी अधिक महत्व दिया जाता है। यदि कोई ग्रह जन्म कुण्डली में नीच राशि में स्थित हो परन्तु नवमांश कुण्डली में वह ग्रह अपनी नीच राशि में उपस्थित हो तो उसकी नीचता भंग हो जाती है जिससे नीचभंग राजयोग का निर्माण होता है।
☸एक अन्य नियम के अनुसार यदि कोई ग्रह अपनी नीच राशि में उपस्थित हो और उसी राशि में कोई ग्रह अपनी उच्च अवस्था में उपस्थित हो तो ग्रहों की नीचता भंग हो जाती है।

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नीचभंग राजयोग के परिणामः-

किसी भी जातक की कुण्डली में राजयोग का बनाना बहुत शुभ माना जाता है क्योंकि वैदिक ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार कुण्डली में जितने राजयोगों का निर्माण होता है उतने ही जातकों शुभ फलों की प्राप्ति होती है। जातक को सभी सुख-सुविधाओं की प्राप्ति होती है तथा समाज में चारों ओर यश फैलता है साथ ही धन-धान्य की कमी नही रहती है। इस योग से आपको अपने जीवन में धीरे-धीरे सफलता प्राप्त होती है। कई बार इन राजयोग द्वारा जातक राजा की भाँति जीवन यापन करता है। अपने परिश्रम द्वारा भी जीवन में एक अच्छा मुकाम प्राप्त करते है। अपने जीवन में संघर्ष अधिक करता है परन्तु उसका उसे अच्छा लाभ प्राप्त होता है। अपने पूरे जीवनकाल में एक बार अवश्य समाज में लोकप्रिय होता है।

नीचभंग राजयोग के उदाहरणः-नीचभंग राजयोग 61

प्रस्तुत कुण्डली वृश्चिक लग्न की है जिसमें चन्द्रमा अपनी नीच राशि वृश्चिक राशि में उपस्थित है परन्तु चन्द्रमा जिस भाव में उपस्थित है उस भाव का स्वामी मंगल चन्द्रमा से केन्द्र भाव में अर्थात प्रथम भाव में विराजमान है जिससे की नीचता भंग हो जाती है और नीचभंग राजयोग का निर्माण हो रहा है जिसके फलस्वरुप जातक को संघर्षों के बाद एक अच्छी सफलता मिलेगी तथा समाज में ऊंचे पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी। राज्य प्रशासन द्वारा भी लाभ प्राप्ति के योग बन रहे है।