महानिशा पूजा

महानिशा अर्थात रात्रि का मध्य भाग। महानिशा पूजा दुर्गाष्टमी की रात्रि में की जाती है। इस दिन माता दुर्गा और माता काली की पूजा-अर्चना की जाती है। जिस रात्रि को अष्टमी होती है उसी तिथि की रात्रि को महानिशा पूजा के नाम से जाना जाता है। इस दिन विधि पूर्वक पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

                                          क्या है महानिशा पूजा

हिन्दू धर्म मे दो प्रकार की नवरात्रि मनाई जाती है। जिसमे आश्विन मे आने वाली पहले नवरात्रि तथा दूसरी चैत्र मास में आने वाली नवरात्रि होती है। इस दिन माता को प्रसन्न करने के लिए तंत्रिका पूजा की जाती है। कुछ लोग बलि भी देते है लेकिन यह बलि पूर्ण रुप से सात्विक होती है जो लोग लम्बे समय से किसी रोग से परेशान रहते है। वो इस दिन रात्रि को नदी के तट पर स्थित शिव मन्दिर पर विशेष रुप से पूजा करते है। वैसे तो माँ सदैव ही अपने बच्चों पर अपना प्रेम और आशीर्वाद बनायें रखती है, परन्तु इन विशेष नौ दिनों में माँ अपने सभी बच्चों के घरों मे आती है।

                           महानिशा पूजन की कुछ महत्वपूर्ण बातें

महानिशा के दिन रात्रि में माँ दुर्गा एवं काली माता का पूजन होता है। माता की कृपा प्राप्त करने के लिए तांत्रिक पुजाएं भी होती है। इसके साथ ही माँ काली के स्थान पर हवन पूजन का कार्य भी किया जाता है। इस दिन नारियल की बलि दी जाती है और दुर्गासप्तशती के कुछ मुख्य पृष्ठों का पाठ होता है। जो लोग राजनीति से जुड़े होते है वे अपने विजय प्राप्ति के लिए रात्रि में बंगलामुखी अनुष्ठान भी करवा सकते है। पीले वस्त्रों में कुश के आसन पर और हल्दी की माला से इसका वृहद अनुष्ठान तांत्रिक इस रात्रि करते है। माता काली को प्रसन्न करने के लिए यह दिन बहुत शुभ माना जाता है। मंदिर मे माता के लिए भोग बनाते है। महानिशा के रात्रि में सिद्धि कुंजिक स्त्रोत का पाठ 18 बार करके सप्त श्लोकी दुर्गा और बंगलामुखी मंत्र पढ़कर माता को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इस रात्रि में माता काली से कई सिद्धियां प्राप्त की जा सकती है। इसके अलावा इस दिन धन, मान पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए भी पूजा-पाठ किया जाता है। ऋग्वैदिक श्री सूक्त का पाठ करके हवन करने से धन का आगमन बना रहता है। तांत्रिक इस दिन यंत्र भी बनाते है और उस यंत्र को ताबीज में भरकर धारण करने के उपयोग मे लाया जाता है।

                                              महानिशा पूजा विधि

☸सर्वप्रथम रात्रि के समय स्नान आदि कर स्वयं को शुद्ध कर लें।
☸उसके पश्चात एक आसन लें और उस पर बैठें।
☸इसके पश्चात एक चौंकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर कलश की स्थापना करें।
☸कलश स्थापना के बाद माँ की मूर्ति की स्थापना करें।
☸अब षोडशोपचार पूजन करें।

                                         षोडशोपचार पूजन का कृत्य

प्रथम उपचारः- देवताओं का आवाह्न करनाः-
आवाह्न का अर्थ होता है देवताओ को आमंत्रित करना। हाथ मे पुष्प एवं अक्षत लेकर भगवान से प्रार्थना करे कि हे ! भगवान आप अपने सह परिवार एवं समस्त देवी देवताओं सहित हमारे सामने रखी मूर्तियों में विराजमान हो और हमारी पूजा को स्वीकार करें एवं पूजा मे हुई भूल-चूक को माफ करें। आवाह्न के पश्चात देवी देवता के नाम लेकर अंत में नमः बोलते हुए उन्हें अक्षत अथवा पुष्प अर्पित करकें हाथ जोड़े।

दूसरा उपचारः- देवी देवता को आसन देना। उसके बाद हाथ में फूल एवं अक्षत लें और देवी के आगमन के पश्चात उन्हें उनके कोमल एवं साज सजावट वाले सिंहासन पर विराजमान की प्रार्थना करें।

तीसरा उपचारः- पाह्य देवताओं को चरण धोने के लिए जल देना। देवी की मूर्ति एक बर्तन में रखें एवं उनके चरण धोएं।

चौथा उपचारः- अर्ग (देवता को हाथ धोने के लिए जल देना), चरण धोने के बाद देवी माँ के हाथों पर जल अर्पित करें।

पांचवा उपचारः- आचमन (देवता को कुल्ला करने के लिए जल देना ), आचमन करने के लिए जल को उसी मात्र में छोड़े जिसमें माता की मूर्ति रखी हो।

छठा उपचारः- स्नान (देवता पर जल चढ़ाना),स्नान कराने के लिए देवी माँ को पुष्प से जल का छींटा दें। अथवा माता को पहले पंचामृत से स्नान करवाएं।

सातवां उपचारः- देवता को वस्त्र देना, माँ को सोलह श्रृंगार एवं लाल वस्त्र अर्पित करें।

आठवा उपचारः- देवता को उपवस्त्र अथवा जनेऊ देना
देवी माता को यह अर्पित नहीं किया जाता है।

नौवा उपचारः- नौंवे उपचार से तेरहवें उपचार तक, पंचोपचार करें।
1. देवी माँ को गुलाब का इत्र, हल्दी एवं कुमकुम अर्पित करें।
2. देवी माँ को पुष्प एवं बेल पत्र अर्पित करें।
3. उसके बाद माता के समक्ष धूप एवं अगरबत्ती जलाएं।
4. उसके बाद माता के समक्ष घी का दीपक जलाएं।
5. माँ को मिठाईयो का भोग भी लगाएं।

चौदहवां उपचारः- देवता को मनः पूर्वक नमस्कार करना। माँ का ध्यान करना और उन्हें प्रणाम भी करें।

पंद्रहवा उपचारः- परिक्रमा करना, अब माँ की परिक्रमा करें अगर परिक्रमा करने की व्यवस्था न हो तो अपने स्थान पर ही खड़े होकर तीन बार घूमें।

सोलहवां उपचारः- मंत्र पुष्पांजलि, परिक्रमा के उपरांत मंत्रपुष्प-उच्चारण कर, देवी माँ को अक्षत अर्पित करें। तत्पश्चात पूजा में ज्ञात-अज्ञात गलतियों तथा त्रुटियों के लिए अंत में देवताओं से क्षमा मांगे और पूजा का समापन करें।

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