मृत्यु से जुड़ा है सूतक और पातक, आज ही पढ़ें | Sutak and Patak Benefit |

हिन्दू सनातन धर्म में कई प्रकार के पूजा-पाठ, व्रत त्यौहार इत्यादि का उल्लेख मिलता है। उसी प्रकार हिन्दू धर्म में सूतक एवं पातक नाम की दो परम्पराओं का भी उल्लेख मिलता हैं। सूतक काल किसी विशेष परिस्थिति में लगता है तथा सूतक काल को अशौच काल भी कहते हैं। सूतक स्वं पातक काल में कई कार्यों को करना वर्जित माना जाता है। घर में जब किसी की मृत्यु हो जाए अथवा जब कोई जन्म लेता है तो सूतक काल लगता है परन्तु आज के आधुनिक समय में सूतक और पातक के नियमों को बहुत ही कम लोग जानते हैं जिसके कारण वह सही तरीके से इन नियमों का पालन नही कर पाते हैं आज हम प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य के. एम. सिन्हा जी द्वारा जानेगें कि क्या होता है सूतक और पातक

क्या है सूतक कैसे जाने

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जब घर-परिवार में किसी शिशु का जन्म होता है तब सूतक काल का आरम्भ होता है। इस दौरान घर में किसी भी प्रकार का धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है तथा धार्मिक स्थानों पर जाना एवं मंदिर से जुड़ा हुआ कोई काम भी करना वर्जित माना जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में सूतक काल को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार आदि में इसे सूतक माना जाता है परन्तु महाराष्ट्र में वृद्धि तथा राजस्थान में सावड़ के नाम से विख्यात है।

क्या है पातक

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जब किसी शिशु का जन्म होता है तब घरवालो पर सूतक लगता है, उसी प्रकार घर पर किसी परिजन की मृत्यु हो जाने पर पूरे 13 दिन पातक काल माना जाता है। इस दौरान भी शुभ कार्यों को करना वर्जित माना जाता है। इसके साथ ही किसी दूसरे व्यक्ति के घर आना जाना या किसी समारोह में शामिल होना भी वर्जित होता है। इसे ही पातक के नाम से जानते हैं। सूतक का संबंध जन्म मरण के कारण हुई अशुद्धि से हैं क्योंकि प्रसव के दौरान हुई हिंसा एवं जन्म समय मे नाल काटा जाता है, उसमें लगने वाले दोष का प्रायश्चित करने के लिए सूतक लगता है।

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संक्षिप्त में कहा जाए तो जन्म के कारण फैली हुई अशुद्धि को सूतक कहा जाता है तथा मृत्य के द्वारा फैली हुई अशुद्धि को पातक कहा जाता है इन दोनों कालों के दौरान कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है।

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जाने कितने दिन सूतक-पातक का समय

धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अलग-अलग वर्णों के लिए अलग-अलग सूतक काल की मान्यता दी गई है। शास्त्रों के अनुसार यदि किसी ब्राह्मण के घर मृत्यु हो गई हो तो उनके वहां 10 दिनों तक सूतक काल मान्य होता है तथा किसी क्षत्रिय के वहां मृत्यु होने पर 12 दिनों का एवं इसी प्रकार वैश्य वर्ग के लोगों को 15 दिनों तथा शूद्र वर्णों के घर में मृत्यु हो जाने पर 1 माह तक यह सूतक काल मान्य होता है। सामान्यतः यह अवधि 13 दिनों के लिए मानी जाती है।

शास्त्रों एवं मान्यताओं के अनुसार जब किसी के घर मृत्यु हो जाए तो त्रयोदशी संस्कार अर्थात तेरहवीं के बाद पूजा पाठ का काम किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के दौरान सबसे पहले भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसके साथ ही सत्यनारायण भगवान की कथा भी किया जाता है जिससे पातक पूरी तरह से नष्ट हो जाए।

यदि किसी जातक के घर में पहले से ही सूतक-पातक काल लगा हो और उसके समाप्ति के एक दिन पहले अर्थात दसवें दिन की रात्रि के तीसरे पहर से पहले किसी और सदस्य की मृत्यु हो जाए तो सूतक काल 2 दिनों के लिए बढ़ जाता है।

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इसके अलावा यदि किसी अन्य सदस्य की मृत्यु दसवें दिन के चौथे पहर में हो तो सूतक काल की अवधि 3 दिन तक बढ़ जाती हैं। यह सूतक काल केवल घर के अन्य सदस्यों के लिए मान्य होता है अर्थात जो जातक क्रिया कर्म को पूर्ण करते हैं उनके लिए 10 दिनों तक ही सूतक काल मान्य होता है।

शास्त्रों के अनुसार यदि किसी जातक के पिता की मृत्यु होने के पश्चात 10 दिनों के अन्दर ही माता की मृत्यु  हो जाती है तो क्रिया क्रम को पूरा करने वाले जातक एवं उसके परिवार के सभी सदस्यों को ऊपर डेढ़ दिनों का सूतक और भी अधिक बढ़ जाता है परन्तु यदि माता की मृत्यु के 10 दिनों के अन्दर पिता की मृत्यु हो जाए तो पातक 10 दिनों तक मान्य होगा।

मृत्यु व्यक्ति के परिवारवालों को 10 दिन तथा अत्यक्रिया करने वाले व्यक्ति को 12 अथवा 13 दिन तक सूतक काल का पालन करना होता है। सामान्यतः यह सूतक काल 45 दिनों तक माना जाता है और इस दौरान कोई भी किसी के घर नही जाता है।

किसी भी शवयात्रा में जाने वालों को 1 दिन शव छुने वाले को 3 दिन और शव को कंधा देने वाले को 8 दिन की अशुद्धि मानी जाती है वहीं यदि कोई आत्महत्या कर लें तो 6 माह तक पातक माना जाता है। छह माह तक वहां भोजन अथवा जल ग्रहण नहीं किया जा सकता है।

यदि परिवार में किसी महिला का गर्भपात हो जाए तो जितने माह का गर्भ पतित हुआ होता है उतने ही माह का पातक माना जाता है। जैसे यदि किसी स्त्री का 2 माह का गर्भपात हुआ है तो 2 माह तक पातक माना जायेगा परन्तु परिवार में कोई सदस्य मुनि या साध्वी है तो उसे जन्म मरण का सूतक नही लगता है। यदि परिवार के ऐसे सदस्यों की मृत्यु हो जाए तो एक दिन का पातक लगता है।

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इसी प्रकार घर के पालतू गाय, भैसे, घोड़ी, बकरी इत्यादि के घर में बच्चें होने पर एक दिन का सूतक काल मान्य होगा परन्तु यदि बच्चें का जन्म घर से बाहर हो तो कोई सूतक नही लगता है।

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विवाहितों के लिए सूतक काल

किसी भी विवाहित पुत्री के लिए 3 दिनों तक सूतक काल मान्य होता है अर्थात किसी पुत्री के विवाह के पश्चात माता-पिता की मृत्यु हो जाए तो पुत्री के ससुराल वालों के 3 दिन तक ही सूतक काल मान्य होता है।

सूतक-पातक के नियम

☸सूतक पातक के दौरान किसी सामाजिक या धार्मिक कार्यों में हिस्सा न लें।
☸किसी भी दूसरे व्यक्ति के घर न जाए और न ही किसी प्रकार का कोई भ्रमण करें।
☸सूतक पातक की अवधि में गुरू, पूजन प्राक्षाल, आहार इत्यादि काम वर्जित माने जाते हैं।
☸यदि किसी के जन्म के कारण सूतक लगा हो तो भगवान का भजन करें लेकिन मृत्यु के कारण पातक लगा हो तो इस दौरान गरुढ़ पुराण सुनें।
☸सूतक एवं पातक में किसी अन्य व्यक्ति को स्पर्श न करें।

कब-कब लगता है सूतक काल

सूतक काल एवं पातक काल विशेष परिस्थितियों जैसे जन्म काल, मरण काल, स्त्री के मासिक धर्म काल, ग्रहण काल एवं गर्भपात के दौरान लगता है।