क्यो मनाया जाता है रक्षाबन्धन और क्या है इसकी पौराणिक कथाए

रक्षाबन्धन का त्यौहार श्रावण माह के पूर्णिमा को मनाया जाता है यह त्यौहार भाई-बहन के स्नेह को दर्शाता है और उनको एक प्रेम-डोर से बांधता है इस दिन बहन अपने भाई को तिलक लगाती है और उसके रक्षा के लिए रक्षाबन्धन बांधती है जिसको राखी कहा जाता है इस त्यौहार को हिन्दू व जैन दोनो ही धर्म के लोग श्रावण मास के पूर्णिमा को मनाते है, रक्षाबन्धन मे राखी या रक्षासूत्र का अत्यधिक महत्व है जबकि राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती रंगीन कलावे, रेशमी धागा तथा सोने या चाँदी जैसी मंहगी वस्तु भी हो सकता है, रक्षाबन्धन भाई बहन के रिश्ते का प्रतीक है और रक्षाबन्धत के दिन बहने अपने भाइयों की तरक्की के लिए भगवान से प्रार्थना करती है। रक्षाबन्धन के दिन भाई भी अपने बहनो को उपहार देते है, रक्षाबन्धत एक ऐसा त्यौहार है जो भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत बनाता है और इस त्यौहार के दिन सभी परिवार एकजुट हो जाते है और राखी, मिठाई, उपहार के जरीए अपने प्रेम को साझा करते है।

         क्यो मनाया जाता है रक्षाबन्धन और क्या है इसकी पौराणिक कथाए

हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार रक्षाबन्धन मनाने के पीछे कई कहानियाॅ प्रचलित है, आइए जानते है रक्षाबन्धन से जुड़ी कुछ कथाओं के बारे में –

                                  माँ लक्ष्मी और राजा बलि की कथा

यह कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुडी हुई है, भगवान विष्णु ने जब वामन अवतार लिया था तब उन्होने राजा बलि से तीन पग जमीन का दान माँगा, दानबीर बलि भी इसके लिए सहमत हो गए। वामन ने जब अपने पहले ही पग में धरती नाप ली तब बलि को पता चल गया कि ये वामन कोई और नही साक्षात भगवान विष्णु है तब बलि ने बड़ी विनम्रता से भगवान हरि को प्रणाम किया और दूसरा पग रखने के लिए अपने शीश को प्रस्तुत किया इस पर भगवान प्रसन्न होकर राजा बलि से वरदान मांगने के लिए बोले असुरो के राजा बलि वरदान में भगवान विष्णु को ही अपने द्वार पर खड़े होने का वरदान मांग लिया इस प्रकार स्वयं हरि अपने ही दिये गए वरदान में फंस गए तब माता लक्ष्मी ने नारद मुनि के सलाहनुसार राजा बलि को राखी बांधी और उपहार के स्वरुप भगवान विष्णु को मांग ली।

                                      द्रौपदी और श्रीकृष्ण की कथा

पौराणिक कथाओ के अनुसार जब महाभारत में शिशुपाल के साथ युद्ध के दौरान भगवान श्री कृष्ण की तर्जनी उंगली कट गई तब द्रौपदी कृष्ण जी के पास पहुचीं और अपने साड़ी से एक टुकड़ा फाड़कर उनको बांध दिया इस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी, इसके बदले मे श्री कृष्ण जी ने द्रौपदी के चीर-हरण के समय रक्षा किया था तभी से प्रत्येक वर्ष रक्षाबन्धन मनाने की रिति चली आ रही है।

                                            रक्षाबन्धन का महत्वः

इन कथाओं के अनुसार यह जानकारी मिलती है कि रक्षाबन्धन के दिन कलाई पर राखी बांधने के साथ ही उसके बदले मांगे गए और दिये गए वचनों का बहुत महत्व होता है इसलिए रक्षाबन्धन के दिन बहन अपने भाइयो को राखी बांधती है और भाई अपने बहन की रक्षा करने का वचन भी देते है। बहन, भाई की कुशलता और सफलता की कामना करती है। ये वचन और भाव ही रक्षाबन्धन के त्यौहार का सबसे महत्वपूर्ण भाग है ऐसा इसलिए क्योंकि प्रेम और विश्वास का यही बंधन भाई-बहन के रिश्ते के स्नेह की डोर अर्थात् राखी से होती है।

                                राखी बांधने की विधि और उसके मंत्र

☸ रक्षाबन्धन के दिन सर्वप्रथम स्नान करे देवताओ को प्रणाम करे इस दिन देवताओ और कुल देवी का आशीर्वाद अवश्य लें।
☸ पीतल, चांदी या ताम्बे के थाली में राखी, अक्षत रोली या सिंदुर रखे और उसको इत्र या जल से भीगा लें।
☸ राखी वाले थाल को पूजा के स्थान पर रखें और सर्वप्रथम राखी बाल गोपाल या अपने इष्ट देवता को अर्पित करें।
☸ तत्पश्चात् अपने भाई को पूर्व दिशा में खड़े करे जिससे आपके राखी को देवताओ का आशीर्वाद भी प्राप्त हो।
☸ राखी बांधते समय अपने भाई के उपर कोई स्वच्छ वस्त्र रखे।
☸ बहन सबसे पहले अपने भाई के माथे पर रोली या सिंदूर का तिलक लगाएं।
☸ तिलक के उपर अक्षत लगाए और आशीर्वाद स्वरुप भाई के उपर कुछ अक्षत छीटे।
☸ भाई की नजर उतारने के लिए दीप से आरती दिखाए।
☸ भाई के दायीं कलाई में राखी बांधते हुए मंत्र का उच्चारण करे इससे राखी के धागो में शक्ति का संचार होता है।
☸ भाई बहन एक दूसरे को मिठाई खिलाये।
☸ अगर भाई बड़ा हो तो बहने भाई का चरण स्पर्श करे यदि बहने बड़ी हो तो भाइयो को बहनो के चरण छुकर आशीर्वाद लेना चाहिए।
☸ भाई वस्त्र आभूषण या धन देकर बहन के सुखी जीवन की कामना करें।

                                         राखी बांधने का मंत्र

येन बुद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः तेन त्वाम्
प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचलः।

सिंदूर रोली या चंदन लगाने का मंत्रः

सिन्दूरं सौभाग्य वर्धनम् पवित्रम पाप नाशनम्।
आपदं हरते नित्यं लक्ष्मीस्तिष्ठति सर्वदा।।

रक्षाबन्धन शुभ तिथि एवं मुहुर्तः-

शुभ तिथिः- 11 अगस्त 2022
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भः- 11 अगस्त 2022 सुबह 10ः38 मिनट से
पूर्णिमा तिथि समापनः- 12 अगस्त 2022 सुबह 07ः05 बजे तक
शुभ मुहूर्तः- सुबह 09ः28 मिनट से रात्रि 09ः14 बजे तक।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *