रणथम्भौर के गणेश मंदिर में विवाह के कार्ड का रहस्य

हिन्दू धर्म की परम्परा के अनुसार भगवान श्री गणेश जी की पूजा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और कल्याणकारी माना जाता है। यदि आप किसी कार्यों में सफल्ता प्राप्त करना चाहते हैं, या अपने मनोकामनाओं की पूर्ति, स्त्री, पुत्र, पौत्र तथा धन समृद्धि प्राप्त करना चाहते हैं साथ ही जीवन में अचानक से किसी संकट को दूर करना चाहते हैं तो आपको अवश्य ही गणेश भगवान जी की आराधना करनी चाहिए।

हिन्दू धर्म की प्राचीन परम्पराओं के अनुसार घर में हो रहे मांगलिक कार्य जैसे शादी, विवाह, पूजा, मुंडन, गृह प्रवेश इत्यादि सभी शुभ कार्यों के लिए सबसे पहले भगवान गणेश जी की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके अलावा शिक्षा से लेकर, नया वाहन खरीदने, व्यापार से लेकर, विवाह तक के प्रत्येक कार्य के लिए गणपति बप्पा को ही सबसे पहले आमंत्रित किया जाता है।

इसलिए हिन्दू धर्म में प्राचीन परम्पराओं के अनुसार सभी लोग अपने पुत्र-पुत्री के विवाह के लिए कार्ड पर सबसे पहले गणेश जी की तस्वीर छपवाते हैं।

गणेश जी को समर्पित होता है विवाह का पहला कार्ड

आपको यह बात पहले से ही पता होगी कि किसी भी शुभ कार्य की शुरूआत करने से पहले हमे भगवान का नाम अवश्य लेना चाहिए। ठीक उसी प्रकार से हमारे घर में होने वाले बड़े-बड़े मांगलिक कार्यों के लिए सबसे पहले हमे भगवान का आशीर्वाद ले लेना चाहिए। हिन्दू धर्म में किसी भी पूजा या शुभ कार्यों की शुरूआत भगवान गणेश जी के साथ होती है इसलिए विवाह का पहला कार्ड भी भगवान गणेश जी को ही दिया जाता है।

विवाह जैसा बड़ा कार्य बिना किसी विघ्न के अच्छे से सम्पन्न हो जायें इसलिए सबसे पहले गणेश जी को पीला चावल और लड्डू का भोग अर्पित करके उनके आगे पूरा परिवार एकत्रित होकर विवाह में आने के लिए उन्हें आमंत्रित करता है और यह मनोकामना माँगता है कि विवाह में किसी प्रकार की कोई बाधा न आये और विवाह एकदम अच्छे से सम्पन्न हो जायें। गणेश भगवान जी को कार्ड चढ़ाने के बाद दूसरा कार्ड दुल्हे के यहाँ और दुल्हन के ननिहाल में दिया जाता है। उसके बाद ही सारे नात रिश्तेदारों के यहाँ विवाह का का कार्ड बाँटने की प्रक्रिया शुरू की जाती है।

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रणथम्भौर स्थित गणेश मंदिर का इतिहास

रणथम्भौर मंदिर में स्थित गणेश जी के मंदिर के इतिहास की बात करें तो यह मंदिर और इस मंदिर का इतिहास लगभग 1300 वर्ष पुराना है। यह मंदिर राजस्थान के माधवपुर के सवाई जिले में स्थित है। इस इतिहास के अनुसार रणथम्भौर के अंतिम शासक राणा हम्मीर देव चैहान जी थे यह पृथ्वीराज चैहान के वंशज थे शुरू से ही अपने हठी स्वभाव के कारण उनका नाम हम्मीर रखा गया। 1299 ई0 से अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर के दुर्ग पर आक्रमण कर उस किले को चारों ओर से घेर लिया जिसके कारण किले का राशन पूरी तरह खत्म होने लगा। बुरी तरह से अपनी हार को सामने देखते हुए राणा जी ने भगवान श्री गणेश जी की पूजा-अर्चना करना शुरू कर दिया। उसकी पूजा और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश जी की प्रतिमा उस किले में प्रकट हो गई। इससे राणा की सेना ने खिलजी की सेना को परास्त कर दिया। कुछ कही गई मान्यताओं के अनुसार भगवान गणेश जी की प्रतिमा किले में प्रकट हो गई थी परन्तु कुछ समय बीत जाने के बाद वह प्रतिमा उस किले से विलुप्त हो गई।

रणथम्भौर स्थित त्रिनेत्र गणेश भगवान जी को विवाह का पहला निमंत्रण

रणथम्भौर के त्रिनेत्र गणेश भगवान की मान्यता के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण जी ने रूकमणि से विवाह किया तो वे उस समय भगवान गणेश जी को विवाह के लिए निमंत्रण देना भूल गये, जिससे क्रोधित होकर उन्होंने अपने सवारी मूषकों की सेना को भगवान श्री कृष्ण जी का रास्ता रोकने के लिए भेज दिया। गणेश जी के द्वारा भेजे गये मूषकों ने श्री कृष्ण जी के रथ के आगे एक बिल खोद दिया जिससे प्रभु श्री कृष्ण जी का रथ वहीं जाकर धंस गया।

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ऐसा होते ही भगवान श्री कृष्ण जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और शर्मिंदा होते हुए अपनी भूल को सुधारने के लिए गणेश जी की पूजा की और उन्हें अपने विवाह में शामिल करने के लिए रणथम्भौर के त्रिनेत्र मंदिर में लेने आये।

उसी समय से सर्वप्रथम गणेश जी को ही किसी भी शुभ कार्यों के लिए पूज्य माना जाने लगा। इसलिए सभी मांगलिक कार्यों के लिए विशेष रूप से विवाह का कार्ड देने के लिए रणथम्भौर मंदिर में स्थित गणेश जी को सर्वप्रथम कार्ड भेजने का अत्यधिक महत्व होता है। इसके अलावा गणेश जी से अपने मन की बात कहने और विवाह बिना अड़चन के सम्पन्न होने के लिए उस विवाह के कार्ड के साथ एक चिट्ठी भी भेज दी जाती है। प्राचीन समय से लेकर वर्तमान तक प्रतिदिन हजारों चिट्ठियाँ इस मंदिर में पहुँचाई जा चुकी है जिसके कारण इस मंदिर का महत्व दोगुना हो गया है।

रणथम्भौर स्थित गणेश मंदिर का महत्व

रणथम्भौर में स्थित गणेश जी की प्रतिमा त्रिनेत्र वाली है। आपको बता दें इस पूरी दुनिया में गणेश जी का त्रिनेत्र स्वरूप केवल रणथम्भौर के मंदिर में ही स्थित है। मान्यता के अनुसार कहा यह जाता है कि शिव जी ने गणेश जी को ही अपना उत्तराधिकारी मानकर अपना ही त्रिनेत्र प्रदान किया था। यहाँ के मंदिर में गणेश चतुर्थी के दिन स्वर्ण के वरक से इनका श्रृंगार किया जाता है।

गणेश जी की यहाँ स्थित प्रतिमा स्वयं भू मानी जाती है अपने इस स्वयं भू रूप में गणेश जी अपने आप किसी भी स्थान पर प्रकट हो जाते है। इस पूरी दुनिया में गणेश जी की केवल 4 स्वयं भू प्रतिमायें स्थित हैं जिसके नाम सिद्धपुर गणेश मंदिर, अवंतिका गणेश मंदिर, त्रिनेत्र गणेश मंदिर तथा चिंतामण गणेश मंदिर है।

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रणथम्भौर का गणेश मंदिर एक ऐसा मात्र अकेला मंदिर है जहाँ पर भगवान श्री गणेश जी अपने पूर परिवार यानि उनकी दो पत्नियाँ ऋद्धि-सिद्धि और दोनों पुत्र शुभ और लाभ के साथ सपरिवार इस मंदिर में विराजमान है जिसके कारण इस मंदिर की शोभा और भी ज्यादा बढ़ जाती है।

यदि इस मंदिर में जाकर आप विवाह का कार्ड नही चढ़ा सकते तो डाक द्वारा इस मंदिर के पते पर अपना कार्ड भेज सकते हैं। वहाँ के पुजारी डाक द्वारा भेजे गये कार्ड को मंदिर में चढ़ा देते है। गणेश जी को कार्ड चढ़ाने का एक कारण यह भी है कि उन्हें विघ्नेश्वर और विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है। भगवान गणेश जी के द्वारा लोगों का शुभ कार्य निर्विघ्न कराने के कारण भी इन्हें प्रथम पूज्य मानकर इन्हें विवाह का कार्ड श्रद्धापूर्वक अर्पित किया जाता है।