सूर्य की महादशा में अन्य ग्रहों की अन्तर्दशा फल

सूर्य की महादशा में सूर्य के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फल:- यदि कुण्डली में सूर्य शुभ हो तो सूर्य अपनी दशा एवं अन्तर्दशा में शुभ फल देता है। जिसके फल स्वरुप जातक के धन-सम्पत्ति में वृद्धि होती है तथा नौकरी व्यवसाय में भी उन्नति के योग बनते है एवं प्रशासन द्वारा भी लाभ की प्राप्ति होती है तथा समाज में मान, पद एवं प्रतिष्ठा बढ़ता है ।
अशुभ फल:- यदि सूर्य कुण्डली में अकारक हो एवं पाप ग्रहों से दृष्टि हो तो इसके विपरीत परिणाम देखने को मिलते है। स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है जैसे- फोड़े, फुन्सी, दाद, खाज एवं खुजली की समस्या से परेशान रहते है तथा प्रशासन द्वारा दण्डित होेने का भय बना रहता है और खर्च की अधिकता होने के कारण आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो जाती है।

सूर्य की महादशा में चन्द्रमा के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फल:- यदि कुण्डली में चन्द्रमा उच्च राशि का हो, स्वगृही हो, मित्रक्षेत्री हो और साथ ही शुभ प्रभाव में होकर सूर्य का मित्र हो तथा सूर्य से केन्द्र, धन अथवा आय स्थान में स्थित हो तो शुभ फल प्रदान करता है और धन-धान्य में वृद्धि करता है और साथ ही नौकरी में भी वृद्धि करता है और जातक को स्त्री एवं संतान का भी सुख मिलता है विरोधी गुटों से सन्धि होती है।
अशुभ फल:- यदि चन्द्रमा क्षीणावस्था में पाप प्रभाव में सूर्य से छठे या आठवें में स्थित हो तो अशुभ फल ही मिलते है। जातक में काम वासना बढ़ जाती है, प्रेम-प्रसंगो में अपयश मिलता है, धन-हानि तथा लोगों से व्यर्थ की तकरार होती है तथ चन्द्रमा से सम्बन्धित रोग उसे घेर लेते है।

सूर्य की महादशा में मंगल के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फल:- यदि कुण्डली में मंगल उच्च राशि का होकर शुभ प्रभाव में तथा दशानाथ से व लग्न से शुभ स्थानगत हो तो जातक इसकी दशा में भूमि एवं कृषि कार्यों से लाभ प्राप्त कर लेता है और जातक को नये गृह की प्राप्ति करवाता है यदि मंगल लाभ अथवा भाग्य भाव के अधिपति से युक्त हो तो जातक को विशेष रुप से वाहन, मकान तथा धन का भी लाभ प्रदान करता है यदि व्यक्ति किसी सेना मे हो तो उसे उच्च पद की प्राप्ति भी होती है। साथ ही साथ उसे पदोन्नति भी मिलती है।
अशुभ फल:- यदि मंगल अशुभ अवस्था में होकर त्रिक स्थान में स्थित हो तो जातक को सेना पुलिस व चोर-लुटेरों से भी भय रहता है। साथ ही परिवार एवं मित्रों से व्यर्थ के झगड़े भी होते है धन व भूमि का नाश तथा रक्त पीड़ा, नेत्र पीड़ा, रक्तचाप एवं नन्दाग्नि जैसे रोग हो जाते है। जातक का शरीर दुबला-पतला हो जाता है। साथ ही उनके अन्दर विफलता एवं घबराहट बढ़ जाती है।

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सूर्य की महादशा में राहु के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फल:- राहु सूर्य का प्रबल शत्रु है, अतः सूर्य की महादशा में राहु की अन्तर्दशा कोई विशेष फल प्रदान नही कर पाता है। यदि राहु शुभ ग्रह व राशि में होकर सूर्य से केन्द्र में हो और द्वितीय अथवा एकादश भाव में हो तो दशा के प्रारम्भ मे कुछ अशुभ फल तथा अन्त में कुछ अच्छे फल प्रदान करता है। ऐसे मे जातक निरोगी बना रहता है। जातक को भाग्य में अचानक वृद्धि हो जाती है अगर जातक वैवाहिक है तो उसे पुत्र की प्राप्ति भी होेती है। घर मे मंगल कार्य का होना एवं प्रवास पर जाने से लाभ तथा उन्नति की प्राप्ति का होना जैसे फल की प्राप्ति होती है।
अशुभ फलः– यदि राहु पाप प्रभाव में स्थित है और सूर्य से त्रिक स्थान में गया हो तो जातक को राजकीय दण्ड की हमेशा आशंका बनती रहती है तथा जातक को अनेक प्रकार के भय हमेशा परेशान करते रहते है जैसे- धन का अभाव, कारावास, अकाल मृत्यु, मान, भूमि और द्रव्य का नाश होता है। राहु की दशा में जातक हमेशा परेशान रहेगा और उसे किसी भी प्रकार की सुख की प्राप्ति नही होगी।

सूर्य की महादशा में बृहस्पति के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फलः- सूर्य की महादशा में उच्च, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री या शुभ प्रभावी बृहस्पति की अन्तर्दशा चले तो जातक को अनेक प्रकार के शुभ फलों की प्राप्ति होती है। अगर जातक अविवाहित है तो उसे सर्वगुण सम्पन्न जीवनसाथी की प्राप्ति भी होती है। साथ ही उच्च शिक्षा की प्राप्ति भी होती है एवं धन व मान-सम्मान की प्राप्ति भी हेाती है और राज्यकृपा में पदोन्नति का होना साथ ही गौ, ब्राह्मण, अतिथि, साधू-सन्यासी की सेवा करने की प्रवृत्ति भी बन जाती है। परिवार में खुशियों का वातावरण भी बना रहता है।
अशुभ फलः-यदि बृहस्पति नीच का है तथा पाप मध्यत्व में पापी ग्रहों से दृष्ट अथवा युक्त होकर सूर्य के त्रिक स्थान में स्थित हो तो वह अपनी अन्तर्दशा में जातक को स्त्री व सन्तान के पीड़ा से भय उत्पन्न कर देता है तथा जातक के देह पीड़ा एवं मन में भी भय उत्पन्न कर देता है। जातक पाप कर्म करने लगता है तथा वह अपना सब कुछ बर्बाद कर लेता है तथा जातक को अनेक प्रकार के रोग होने उत्पन्न हो जाते है। जैसे पीलिया, क्षयरोग, अस्थि-पीड़ा एवं पित्तज्वर।

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सूर्य की महादशा में शनि के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फलः- राहु की भांति शनि भी सूर्य का शत्रु ग्रह है। इस दशाकाल में जातक को बहुत कुछ राहु जैसे ही फल मिलते है लेकिन जातक पाप कर्म नही बनता। शनि अपने अन्तर्दशा काल में जातक को स्वल्प धन-धान्य की प्राप्ति कराता है जातक के शत्रु भी नष्ट होते है। यदि शनि उच्च अथवा स्वक्षेत्री होकर केन्द्र, द्वितीय या तृतीय अथवा आय के स्थान में हो तो जातक का कल्याण होता है, निम्न वर्ग के लोगो से लाभ की प्राप्ति होती है न्यायालय में लम्बित केसों में उसे विजय मिलती है।
अशुभ फलः- यदि अशुभ शनि सूर्य से त्रिक स्थान में गया हो तो जातक की बुद्धि भ्रमित हो जाती है। पिता-पुत्र में वैमनस्य बढ़ जाता है शत्रुओं की प्रबलता के कारण चित्र को परिताप पहुँचता है तथा साथ ही अधिकार की हानि होती है व पदोन्नति होकर कार्य-व्यवसाय भी चौपट हो जाता है। सम्पत्ति के साथ शारीरिक-शक्ति भी क्षीण हो जाती है। आत्मघात करने की भी इच्छा होती है और जन्म स्थान की भी त्याग करना पड़ता है।

सूर्य की महादशा में बुध के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फलः- बुध एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के साथ रहकर भी अस्त फल नही देता। यदि बुध परमोच्च, स्वक्षेत्री, मित्रक्षेत्री, शुभ ग्रहों से प्रभावित हो और सूर्य से त्रिक स्थान में न हो तो जातक राज्यकृपा पा जाता है और जातक को पुत्र-पुत्री का पूर्ण सुख मिलता है तथा वाहन एवं वस्त्र आभूषणों की प्राप्ति भी होती है। यदि बुध भाग्य स्थान में भाग्येश से युक्त हो तो जातक की भाग्य में वृद्धि भी करता है। यदि लाभ स्थान में हो तो व्यवसाय में वृद्धि भी करता है। जातक को सम्पूर्ण सुख मिल जाता है।
अशुभ फलः- यदि अशुभ बुध छठे या आठवें घर में स्थित हो तो जातक मन से अशान्त रहता है, प्रवास अधिक करने पड़ते है तथा जातक को धन-हानि होती है और स्वास्थ्य क्षीण हो जाता है। साथ ही कार्य-व्यवसाय ठप्प हो जाता है, जातक को चर्म से सम्बन्धित रोग उत्पन्न हो जाते है जैसे- दाद, खुजली, फोड़ा-फुन्सी आदि रोग हो जाते है तथा जातक अपने धन का एक बड़ा भाग दवा-दारु पर व्यय करने को बाध्य हो जाता है।

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सूर्य की महादशा में केतु का फलः-

शुभ फलः- यदि सूर्य की महादशा में केतु की अन्तर्दशा चल रही हो तो थोड़े शुभ फलो को भी जातक भूल जाता है। क्योंकि प्रायः इस दशा में जातक को अशुभ फल ही प्राप्त होते है और कभी-कभी यह अधिक भी हो जाते है। केतु की महादशा में देह-पीड़ा से भी जातक परेशान हो जाता है और परिजनों से विद्रोह भी हो जाता है। शत्रु वर्ग प्रबल हो जाते है। स्थानान्तरण ऐसी जगह होता है। जहाँ पर जातक को कष्ट ही कष्ट झेलना पड़ता है। दशा के प्रारम्भ काल में थोड़े शुभ फल मिलते है। अल्प धन की प्राप्ति भी होती है। अल्प धन की प्राप्ति होती है तथा सभी शुभ कामों में भी रुचि रहती है लेकिन सूर्य से त्रिक स्थान में स्थित केतु की दशा में धन व स्वास्थ्य की हानि होती है। मन परेशान रहता है और परिजनों से झगड़े भी होते है। दुष्ट संगति में रहने से राज्य दण्ड मिलता है और दुर्घटना में हड्डी टूटने का भय बढ़ जाता है और काम के स्थान पर प्रयत्न करने से भी लाभ नही मिलता है।

सूर्य की महादशा में शुक्र के अन्तर्दशा का फलः-

शुभ फलः- यदि शुक्र उच्च राशि स्वराशि व मित्र राशि का हो तथा शुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट हो तथा सूर्य से दुःस्थान मे स्थित न हो तो सूर्य की महादशा में शुक्र की अन्तर्दशा अति शुभ फलो को देने वाली होती है। विवाहोत्सव पुत्रोत्सव आदि अनेक मंगल कार्य सम्पन्न होते है। राज्य सुख की प्राप्ति होती है। साथ ही पशुधन, रत्न, आभूषण, मिष्ठान, भोजन एवं विविध वस्त्रालंकार मिलते है। नौकर-चाकर, वाहन व मकान का पूर्ण सुख मिलता है तथा मान-सम्मान में वृद्धि होती है।
अशुभ फलः- यदि शुक्र नीच राशि का व पाप प्रभावी होकर सूर्य से त्रिक स्थान में हो तो मानसिक कलह, पत्नी-सुख में कमी, सन्तति कष्ट व विवाह में अवरोध उत्पन्न होते है, स्वजनों से वैमनस्य बढ़ता है। जातक के मान-सम्मान में कमी आती है। साथ ही धन तथा स्वास्थ्य का भी नाश होता है।