सूर्य देव की जन्मकथा का जानिये रोचक रहस्य एवं उनकी आराधना कैसे करें


सूर्य देव की जन्मकथा का जानिये रोचक रहस्य एवं उनकी आराधना कैसे करें

सूर्यदेव जगत की आत्मा हैं तथा उनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। ऋगवेदों में सूर्यदेव को नेत्र की संज्ञा दी गई है इसके साथ ही कुण्डली में भी सूर्य को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सूर्यदेव प्रत्यक्ष रूप में पूजे जाने वाले देवता हैं यही मुख्य कारण है कि हिंदू धर्म में सूर्यदेव को अत्यधिक सम्मान प्राप्त है। सूर्य देव की पत्नी का नाम देवी संज्ञा एवं छाया था जिनसे उन्हें 10संतानों की प्राप्ति हुई।
आज हम दिल्ली के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य के. एम. सिन्हा जी द्वारा जानेंगे कि सूर्यदेव का जन्म कैसे हुआ एवं उनकी उपासना कैसे करें कि वह अत्यन्त श्ीाघ्र प्रसन्न हो जायंे।

सूर्य नमस्कार मंत्रः- सूर्य देव को जल अर्पित करते समय सूर्य नमस्कार मंत्र का जाप अवश्य करें ऐसा करने से मन एवं तन की शुद्धि होती है और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।

 सूर्य नमस्कार मंत्रः- ॐ सूर्याय नमः, ॐ भानवे नमः, ॐ खगाय नमः ।

सूर्य देव की आरतीः- सूर्यदेव की आरती सूर्योदय के पश्चात हम कभी भी कर सकते हैं। सूर्य देव की आरती हमारे जीवन के लिए अत्यधिक लाभदायक होती है। समाज में हमारा मान-सम्मान बढ़ता है तथा आत्मविश्वास बना रहता है। यदि नियमित रूप से सूर्य देव की आरती की जाए तो नकारात्मक विचार जीवन से बुराइयां समाप्त होती है।

नियमित सूर्य चालीसा का पाठः- यदि आप नियमित रूप से सूर्य चालीसा का पाठ करते हैं तो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्राप्त होता है। इसका पाठ जीवन से सभी दुःखो को दूर कर देता है।

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सूर्य मंत्रः– यदि प्रतिदिन सूर्यदेव के मंत्रों का जाप किया जाए तो जीवन की सभी परेशानियां खत्म होती हैं। सूर्य मंत्र के जाप से चिंता, तनाव, नकारात्मक सोच खत्म होती है।

 सूर्य मूल मंत्रः- ॐ हां हीं हौं सा सूर्याय नमः

कैसे हुआ जन्म सूर्य देव का
कहा जाता है कि सूर्यदेव के जन्म के पूर्व पूरे संसार में अंधेरा था। सूर्यदेव के जन्म के पश्चात संसार में प्रकाश की किरण आयी, यही कारण है कि सूर्यदेव को संसार की आत्मा कहा गया है। सूर्य देव के पिता ऋपि कश्यप, ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि के बेटे थंे और सूर्यदेव की माता का नाम अदिती था। ऋषि कश्यप की पत्नी अदिती ने अत्यधिक कठिन तपस्या किया जिसके परिणाम स्वरूप उनसे प्रसन्न होकर सुषुमा नाम की किरण ने उनके गर्भ में प्रवेश किया है। गर्भ धारण के पश्चात भी वह निरन्तर कठिन तपस्या में लगी रहीं और जब यह बात उनके पति को पता चला तो अत्यन्त क्रोधित होकर बोले इतना कठिन व्रत करके क्या गर्भ में पलने वाले शिशु की हत्या करना चाहती हो, उनके इस बात से अदिती को अत्यन्त दुख हुआ और उन्होंने अपने बालक को उदर से बाहर कर दिया जोकि दिव्य तेज से प्रज्वलित हो रहा था और यही दिव्य तेज सूर्य कहलाया अर्थात इस प्रकार सूर्य देव का जन्म हुआ।

सूर्यदेव का वाहन

 

सूर्य देव की जन्मकथा का जानिये रोचक रहस्य एवं उनकी आराधना कैसे करें 1

 सूर्यदेव सात घोड़े के रथ पर सवार होते हैं और इन सभी सात घोड़ों का तेज बहुत ही विकराल होता है यह सात घोड़े सप्ताह के सातों दिनों के प्रतीक माने जाते हैं। इसके साथ ही सूर्यदेव के सारथी देव हैं जो गरुण देव के भाई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्यदेव की यात्रा कभी समाप्त नही होती हैं क्योंकि कहा जाता है यदि सूर्य देव विरामावस्था में आ जायें तो पूरा ब्रह्मण्ड भी विरामावस्या में आ जायेगा। अतः सूर्यदेव का निरन्तर यात्रा करना अत्यन्त आवश्यक है।
सूर्य देव के अस्त्रः- सूर्यदेव के प्रमुख अस्त्र पाश, शक्ति एवं चक्र है।

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सूर्यदेव रामायण और महाभारत में

रामायण ग्रन्थ गोस्वामी तुलसी दास जी द्वारा रचित है जिसमें सूर्यदेव को सुग्रीव का पिता बताया गया है। सुग्रीव ने प्रभु श्रीराम को रावण पर विजय दिलाने में सहायता की थी। प्रभु श्रीराम जी भी सूर्यदेव के वशंज हैं अर्थात वे भी सूर्यवंशी हैं। महाभारत में भी सूर्य का काफी महत्व है। एक काव्य के अनुसार, कुंती को क्रोधी ऋषि दुर्वासा से एक मंत्र के लिए दीक्षा मिली थी। उन्हें वरदान दिया गया था कि जब वह मंत्र का जाप करेंगी तब एक देवता को बुला सकती हंै और उसके माध्यम से एक संतान की प्राप्ति भी कर सकती हंै। इस वरदान का परीक्षण करने के लिए कुंती ने सूर्यदेव को बुलाया और वरदान अनुसार उनसे अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए दबाव डाला।
तब उन्हें एक दिव्य संतान की प्राप्ति हुई परन्तु बिना विवाह के एक संतान की माँ होना उनके लिए असहनीय था और यही कारण है कि कंुती को अपने बेटे कर्ण को त्यागना पड़ा जो कुछ समय पश्चात एक महान योद्धा के रूप में प्रसिद्ध हुए।

सूर्य देव एवं हनुमान का मिलन

धार्मिक एवं पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार की बात है। हनुमान जी आकाश में उड रहे थंे उसी दौरान उनको भूख लग गई और वह भूख से व्याकुल हो गयें तब उन्होंने सूर्यदेव को आम फल समझकर खा लिया था क्यांेकि हनुमान जी को आम अत्यन्त प्रिय था, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि सूर्यदेव सर्वज्ञानी शिक्षक है तब हनुमान जी ने सूर्य देव से अनुरोध किया कि वह आप मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करें परन्तु सूर्यदेव ने यह कहकर मना कर दिया कि वह कभी भी एक स्थान पर स्थिर नही रहते हैं। परन्तु हनुमान जी नहीं मानें और सूर्य देव का पीछा करने लगे एवं निरन्तर उनसे प्रार्थना करते रहें। यह देखकर सूर्यदेव उनको शिक्षा देने के लिए तैयार हो गयें।

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सूर्य देव की पूजाः– सभी सूर्यदेव की पूजा-आराधना करते हैं सूर्य देव को बुद्धि विवेक, आत्मविश्वास, अच्छे स्वास्थ्य, साहस, नेतृत्व गुण, स्वतंत्रता, सफलता, शक्ति का दाता कहा जाता है। अतः हम सभी को प्रातःकाल उठकर नियमित रूप से सूर्यदेव की आराधना करनी चाहिए जिससे जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होगी।

सूर्यदेव का महत्वः- हमारे हिन्दू धर्म में नवग्रहों का उल्लेख मिलता है। यहां तक कि बहुत स्थानों पर नवग्रहों की पूजा भी की जाती है। सूर्य सदैव ज्ञान, शक्ति और स्पष्टता का प्रतीक माने जाते हंै। जीवन में जागरूकता और ज्ञान का प्रकाश लाने के लिए सूर्य की प्रार्थना की जाती हैं।

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