सूर्य देव की शक्तियाँ एवं उनका परिवार

सूर्य, जिन्हें हिन्दू धर्म में ‘सूर्यदेव’ के रुप में पूजा है और ऐसा माना जाता है कि सूर्य देव उन कुछ प्रमुख देवताओं में से एक हैं, जिन्हें हम सभी प्रत्यक्ष रुप से देख सकते हैं आदित्य लोक में भगवान सूर्य कमल पर विराजमान है, उनका वर्ण हिरण्मय अर्थात सोने के रंग का है। उनकी चार भुजाएं हैं जिनमें दो हाथों मे वे पद्म धारण किये हुए हैं और दो हाथों में अभय तथा वर मुद्रा है। इसके साथ ही वे सात घोड़ों के रथ पर सवार रहते हैं। सूर्य देव हनुमान जी के गुरु के रुप में भी प्रसिद्ध है।

वेदों में सूर्यदेव को जगत का आत्मा कहा गया है। सूर्य से ही पृथ्वी पर जीवन संभव है यह सर्वमान्य सत्य है। वैदिक काल में आर्य सूर्य को ही सारे जगत का कर्ता-धर्ता मानते थें। सूर्य शब्द का अर्थ है सर्व प्रकाशक। ऋग्वेद में भी सूर्य को विशेष स्थान प्राप्त है तथा यजुर्वेद में ‘‘चक्षो सूर्यो जायत’’ अर्थात सूर्य भगवान को नेत्र कहा गया है। आज हम प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य के. एम. सिन्हा जी द्वारा जानेंगे कि सूर्यदेव के परिवार एवं उनकी उपासना कैसे करें जो इस प्रकार है

भगवान सूर्य देव का परिवार

हिन्दू धर्म में देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा से सूर्यदेव का विवाह हुआ था। वह बहुत ही रुपवती एवं गुणवती थीं। इसके साथ ही वह एक पवित्र स्त्री थीं लेकिन सूर्य देव मानव रुप में उनके समीप कभी नहीं जाते थें। सूर्यदेव के अत्यन्त तेज के कारण संज्ञा देवी की आंखे बन्द हो जाती थीं और वह अपने पति सूर्यदेव का सुन्दर मुख नहीं देख पाती थीं। संज्ञा देवी को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता और सोचती थीं कि मेरा यह आकर्षक स्वरुप उनके तेज से श्याम वर्ण का हो गया हैं इस प्रकार तो मेरा निर्वाह उनके साथ बहुत कठिनपूर्ण हो सकता है। इन सभी परिस्थितियों से मुक्त होने के लिए संज्ञा देवी ने तपस्या कर शक्ति प्राप्त करने का निश्चय किया।

उसी स्थिति में संज्ञा देवी से सूर्य देव को तीन संतान की प्राप्ति हुई थी। जिनका नाम वैवस्वत मनु, यम एवं यमी (यमुना) था

सूर्य देव के प्रकाशमय तेज को अब सहन करना उनके वश में नही था इसलिए वह अपने ही रुप आकृति तथा वर्ण वाली अपनी छाया को अपने पति की सेवा में छोड़कर चली गई। जब उनके पिता ने उन्हें पुनः अपने घर (सूर्य देव के घर) जाने को कहा तो वह ‘उत्तरकुरु’ (हरियाणा) चली गयीं साथ ही अपने सतीत्व की रक्षा के लिए उन्होंने मन के समान गति करने वाली घोड़ी (अश्विनी) का रुप धारण कर लिया और अपने शक्ति का विस्तार करने के लिए तपस्या करने लगीं।

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उस दौरान सूर्य देव के समीप देवी छाया रहने लगीं। जिनका एक अन्य नाम विक्षुभा भी हैं। देवी छाया पूर्ण रुप से देवी संज्ञा की भांति ही थीं जिसके कारण उनमें अन्तर कर पाना असंभव था और यही कारण था कि सूर्यदेव को छाया के बारे में ज्ञात नही हुआ तथा देवी छाया से सूर्यदेव को चार संतान की प्राप्ति हुई जिनका नाम सावर्णि मनु, शनि, ताप्ति तथा विष्टि (भद्रा) था।

आखिर क्यों हुआ सूर्यदेव को छाया से घृणा

ऐसा कहा जाता है कि छाया अपनी संतानों की भाँति संज्ञा की संतानों वैवस्वत, मनु, यम तथा यमी को प्रेम नहीं करती थीं और उनका निरन्तर तिरस्कार करती थीं। देवी संज्ञा के बड़े पुत्र वैवस्वत मनु ने इन परिस्थितियों से समझौता कर लिया लेकिन उनके छोटे पुत्र यम इसको सहन नहीं कर पायें और परिवार में विवाद उत्पन्न हो गया।

एक दिन यमुना और ताप्ति में विवाद हो गया और वे एक दूसरे को श्राप देकर नदी में परिवर्तित हो गई इसके कारण देवी छाया ने यम को प्रताड़ित किया और यम आवेश में आकर देवी छाया पर पैर उठा देते हें जिस पर देवी छाया उन्हें श्राप देती हैं कि

‘‘ तुमने मेरे ऊपर चरण उठाया है, इसलिए यदि तुम मेरे श्राप से कलुषित अपने पैर को पृथ्वी पर रखोगे तो कृमि (कीड़े) उसे खा जायेंगे। तुम तुरन्त प्रेतों के राजा हो जाओगे। तुम्हारा प्राणियों के प्राणों की हिंसा करने की वीभत्स कर्म तब तक रहेगा जब इस संसार में सूर्य और चन्द्रमा की उपस्थिति रहेगी।

छाया के श्राप से दुखी होकर यम ने अपने पिता सूर्य से कहा देवी संज्ञा हम लोगों की माता नही हैं वह हमें सवार्णि मनु, शनि, तप्ती व विष्टि की भांति प्रेम नही करती हैं। यह हमें मारती हैं तथा हमारा तिरस्कार भी करती हैं। मेरे द्वारा दुखी होकर पैर उठाने पर उन्होंने मुझे गिर जाने का श्राप दे दिया यह मेरी माता नही हो सकती हैं क्योंकि कहा जाता है कि

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‘‘ पुत्र कुपुत्र हो सकता है परन्तु माता कुमाता नही होती है’’

तब क्रोधवश सूर्य देव नें कहा देवी संज्ञा यह आपके लिए उचित नही है माता अपनी संतनों को एक सा प्रेम करती है तो आप अपनी संतानों में भेदभाव की भावना कैसे रख सकती है। भगवान सूर्य ने अपने महिमा से यम को श्राप मुक्त किया जिसके शक्ति से आज यम धर्मराज के रुप में पाप-पुण्य का निर्णय करते हैं और स्वर्ग में भी उन्हें मान-सम्मान प्राप्त है।

भगवान सूर्य ने यम से कहा सभी पापों का निदान हो सकता है परन्तु माता का श्राप कभी खाली नही जाता है। तुम दुखी न हो मै एक उपाय बताता हूं जिससे तुम इस परिस्थिति से निकल सकते हों तुम्हारा पैर नही लगेगा। केवल इसके एक कण के बराबर मांस और रुधिर लेकर कृमिगण पृथ्वी पर चले जायेंगे इससे माता का श्राप भी सत्य हो जायेगा और तुम्हारे पैर की भी रक्षा हो जायेगी। ब्रह्मा जी की आज्ञा से तुम लोकवाद पद को प्राप्त हो जाओगे। तुम्हारी बहन यमुना का जल गंगाजल के समान पवित्र एवं ताप्ती का जल नर्मदा जल के समान पवित्र माना जायेगा। आज से देवी छाया सब देहों में अव्यवस्थित रहेंगी।

दुखी सूर्य देवी छाया के पास पहुंचे और उनके बाल पकड़ कर पूछा सच-सच बता तू कौन है ? क्योंकि कोई भी माता अपने पुत्र के साथ ऐसा नीच व्यवहार नहीं कर सकती। यह सुनकर देवी छाया ने भयभीत होकर अपना रहस्य उनके सामने प्रकट कर दिया।

छाया के प्रति क्रोध के कारण उसके पुत्र शनि को श्राप देते हुए सूर्य देव ने कहा आज से माता के दोष के कारण तुम्हारी दृष्टि में क्रूरता भरी रहेगी।

इसी दौरान शीघ्र ही सूर्य संज्ञा को ढूढंते हुए उनके पिता विश्वकर्मा के घर पहुंचे उन्होंने यह जिज्ञासा जतायी कि मेरी प्रियतम उन्हें छोड़कर तप करनें क्यों चली गई।

विश्वकर्मा जी ने सूर्यदेव को संज्ञा के उनका तेज न सहन करने और उत्तर कुरु नामक स्थान पर तपस्या करने की बात बताई। साथ ही साथ कहा कि आपके तेज को कम किया जा सकता है। इस पर भगवान सूर्य अपनी पत्नी के लिए कष्ट सहने को तैयार हो गये। विश्वकर्मा जी ने सूर्य की इच्छा पर उनके तेज को वज्र की सान पर खराद कम कर दियें जिसके परिणाम स्वरुप सूर्यदेव की केवल एक हजार किरणें ही शेष रह गई और उनका रुप पहले की अपेक्षा सौम्य बन गया।

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भगवान सूर्य देव ने भी अपना उत्तम रुप प्राप्त कर प्रसन्न मन से अपनी भार्या के दर्शनों की उत्कण्डा से तत्काल उत्तरकुरु की ओर प्रस्थान किया। वहां उन्होंने देखा कि वह अश्विनी का रुप धारण कर विचरण कर रही हैं तब सूर्य देव ने अश्व का रुप धारण किया और संज्ञा देवी से मिले। अश्विनी (देवी संज्ञा) यह सोचकर घबरा गईं कि कहीं किसी पर पुरुष ने उनको स्पर्श न कर लिया हो। अश्वा रुपी संज्ञा ने अश्व रुपी सूर्य को अन्य पुरुष समझकर उनके तेज कों दोनों नासापुटों से बाहर फेंक दिया जिससे दोनों अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति हुई, जो देवताओं के वैद्य कहलाएं। सूर्य देव के तेज अंतिम अंश से रेवन्त नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो गुह्यकों और अश्वों के अधिपति रुप में प्रतिष्ठित हुए।

इन सभी परिस्थितियों के बाद सूर्य देव पुनः अपने वास्तविक अवतार में आये जिसे देखकर माता संज्ञा अत्यन्त प्रसन्न हुई और वें पुनः एक साथ रहने लगे।

भगवान सूर्य देव को सप्तमी तिथि अत्यन्त क्यों प्रिय है

भगवान सूर्यदेव को सप्तमी तिथि अत्यन्त प्रिय हैं क्योंकि आज के दिन पर ही सूर्यदेव को अपनी भार्या संज्ञा पुनः प्राप्त हुई थी। उन्हें अपना दिव्य रुप सप्तमी तिथि को ही मिला साथ ही अश्विनी कुमार एवं रेवन्त की भी प्राप्ति हुई थी।

इस प्रकार सूर्य देव को दस संतानों की प्राप्ति हुई। अतः जीवन में विषमता अच्छी नही होती हैं। हम सभी को एक समान रुप से स्नेह भावना रखनी चाहिए क्योंकि भगवान तो प्रत्येक रुप में समाहित हैं चाहे वह बड़ें हो चाहे वह छोटे हों।