Indira Ekadashi : इंदिरा एकादशी व्रत करने से बनी रहती है श्री विष्णु की कृपा

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार आश्विन का महीना सभी हिन्दुओं के लिए बहुत ही खास होता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को ही इन्दिरा एकादशी मनायी जाती है। भगवान विष्णु जी को समर्पित इन्दिरा एकादशी व्रत में श्राद्ध कर्म के कुछ उपायों को करने से भक्तों को अत्यधिक लाभ मिलता है साथ ही मोक्ष की प्राप्ति भी होती है।
इन्दिरा एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु जी के शालिग्राम स्वरुप की पूजा करना तथा व्रत रखना अत्यधिक फलदायी होता है। ऐसा करने से भगवान विष्णु जी की कृपा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है तथा आपके सभी दुख हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं।

इन्दिरा एकादशी का महत्व

इन्दिरा एकादशी के पूजा के महत्वों की बात करें तो मान्यता के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर ने इंदिरा एकादशी व्रत के महत्वों को अच्छे से समझाया था। उन्होंने कहा कि इन्दिरा एकादशी के दिन श्राद्ध करने का अत्यधिक महत्व होता है। इस एकादशी का व्रत करने का लाभ सीधा हमारे पूर्वजों को मिलता है। इसके अलावा व्रत करने के बाद यदि उन पितरों के नाम पर कुछ दान-दक्षिणा किया जाए तो उन्हें मोक्ष मिलता है साथ ही उन्हें बैकुंठ की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि इस दिन का व्रत करने से भगवान श्री विष्णु जी जीवों को मुक्ति दिलाते हैं। इसके अलावा सभी भक्तों को वासुदेव जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा जातक की सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस दिन के व्रत और पूजन के महत्वों के साथ विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से जातक को दोनों ही लोकों में सुख की प्राप्ति होती है।

इंदिरा एकादशी व्रत की पूजा विधिः-

✨ इंदिरा एकादशी तिथि के दिन सुबह जगकर सभी दैनिक कार्यों से मुक्त होकर स्नानादि करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
✨ उसके बाद भगवान विष्णु जी के शालिग्राम स्वरूप का ध्यान करके श्रद्धापूर्वक इस व्रत को पूरा करने का संकल्प लें।
✨ अपने मंदिर में रखी हुई चैकी को साफ-सुथरा करके उस पर पीले रंग का वस्त्र बिछाकर कुमकुम से उस कपड़े पर स्वास्तिक बनायें।
✨उसके बाद गणेश जी का ध्यान करते हुए ‘ओम गणेशाय नमः’ का जप करते हुए बने हुए स्वास्तिक पर फूल और चावल चढ़ायें।
✨ शुभ मुहूर्त में पूजा स्थल पर शालिग्राम या भगवान विष्णु जी की तस्वीर स्थापित करें ।
✨ उसके बाद गंगाजल से अभिषेक करके उन्हें रोली, चंदन, अक्षत, धूप तथा फूल अर्पित करें।
✨ भगवान विष्णु जी के समक्ष दीपक जलायें और उन्हें फूलों की माला चढ़ायें।
✨ उसके बाद भगवान विष्णु जी की पूजा अर्चना करके उन्हें तुलसी जी का पत्ता अवश्य अर्पित करें।
✨विष्णु सहस्त्रनाम का श्रद्धापूर्वक पाठ करें उसके बाद भगवान विष्णु जी की आरती करें।
✨ आरती करने के बाद भगवान विष्णु जी को मीठा अवश्य भोग लगायें।
✨ शाम के समय विष्णु जी की आरती करने के बाद तुलसी जी के सामने दीपक अवश्य जलायें।
✨ उसके बाद इन्दिरा एकादशी के व्रत की कथा सुनें, अंत में भगवान विष्णु जी की आरती करके भगवान विष्णु जी से प्रार्थना करें।
✨ पूजा के दौरान पितरों के साथ किये गये गलत कर्मों की क्षमा याचना मांगे।
✨ पूजा की समाप्ति के बाद पितरों के नाम से श्राद्ध करके ब्राह्मणों को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा करंे।
✨ उसके बाद द्वादशी के दिन निर्धारित समय में पारण करें और दिन में केवल फलाहार करके रात्रि में भगवान विष्णु जी का जागरण करें।

आदित्य हृदय स्तोत्र संपूर्ण पाठ 

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।

 रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । 

उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम् ।

 येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । 

जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । 

चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम् ॥5॥

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । 

पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।

 एष देवासुरगणांल्लोकान् पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: । 

महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: । 

वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान् । 

सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । 

तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽकों शुमान् ॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: ।

 अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन: ॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: । 

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। 

कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: । 

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥15॥

नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: । 

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: । 

नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।

 नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।

 भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।

 कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । 

नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: । 

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: । 

एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च ।

 यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।

 कीर्तयन् पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम् ।

 एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि । 

एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ॥

 धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान् ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् । 

त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम् । 

सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥30॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।

 निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

विधि विधान से करें पारणः-

किसी भी व्रत को करने के बाद पारण अवश्य किया जाता है। वास्तव में पारण का अर्थ व्रत को तोड़ना होता है और व्रत तोड़ने का एक निश्चित समय और मान्य परम्पराएं होती हैं जिसका पालन करके व्रत तोड़ना ही हमारे व्रत को पूर्ण करता है। अतः इन्दिरा एकादशी के व्रत का पारण द्वादशी तिथि के समाप्त होने के पहले ही करना चाहिए अन्यथा द्वादशी तिथि के उपरांत व्रत का पारण करना अपराध के समान होता है। इसके अलावा व्रत तोड़ने से पहले हरि वासरा यानि (द्वादशी तिथि का पहला चौथाई समय) समाप्त होने के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए। व्रत का पारण करने का सही समय प्रातः काल होता है। इसलिए यदि कोई जातक किसी कारणवश प्रातः काल व्रत का पारण नही कर पाता तो वह मध्याहन में व्रत का पारण कर सकता है।

इन्दिरा एकादशी शुभ मुहूर्त:-

इन्दिरा एकादशी का व्रत 10 अक्टूबर 2023 मंगलवार के दिन मनाया जायेगा।
एकादशी तिथि प्रारम्भः 9 अक्टूबर 2023 दोपहर 12ः36 मिनट से,
एकादशी तिथि समाप्तः- 10 अक्टूबर 2023 दोपहर 03ः08 मिनट तक।
पारण करने का समयः-  11 अक्टूबर 2023 बुधवार सुबह 06ः19 मिनट से, सुबह 08ः39 मिनट तक।