केन्द्राधिपति दोष | kendradhipati dosha |

केन्द्राधिपति दोष होने पर व्यक्ति को कई प्रकार की हर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जब बृहस्पति, शुक्र, बुध और चन्द्रमा ग्रह केन्द्र के स्वामी बन जाते है तब केन्द्राधिपति दोष उत्पन्न होता है। केन्द्राधिपति दोष के निवारण के लिए भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए।

सफलता में बाधक होता है केन्द्राधिपति दोषः- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केन्द्र भाव पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में यदि बृहस्पति स्थित होता है तो केन्द्राधिपति दोष की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार बुध भी केन्द्राधिपति दोष का कारण बनता है। जिस वजह से जीवन में काफी परेशानियां आती है। करियर, शिक्षा में सफलता हाथ नही लगती है। शुक्र की स्थिति में व्यवसाय सम्बन्धित दिक्कतें हो सकती है। चन्द्रमा की वजह से होने वाले केन्द्राधिपति दोष से परिवार में मनमुटाव का माहौल बना रहता है।

ग्रहों के कारण जन्म कुण्डली में केन्द्राधिपति दोष का प्रभावः-

बृहस्पतिः- बृहस्पति सबसे अधिक लाभकारी ग्रह है और कुण्डली में इसकी दृष्टि बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। बृहस्पति की कृपा जातकों के लिए फलदायी सिद्ध होती है। कुण्डली के लग्न मे मिथुन और कन्या राशि पर बृहस्पति की स्थिति का प्रभाव अधिक होता है जैसा की हम जानते है इस दोष का निर्माण बृहस्पति ग्रह द्वारा होता है जब यह केन्द्र भावो यानि पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में स्थित होता है। मिथुन राशि के जातकों के लिए यदि बृहस्पति कन्या राशि में चौथे भाव में स्थित हो तो परिवार में समस्या परिजनों के साथ समस्या, शिक्षा मे बाधाएं आदि का कारण बनता है। यदि कोई जातक मिथुन राशि में लग्न के साथ बृहस्पति की महादशा का सामना कर रहा है और बृहस्पति कन्या राशि चैथे भाव में स्थित हो तो जातक की शिक्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि बृहस्पति मिथुन लग्न के लिए दसवें भाव में स्थित हो और बृहस्पति की महादशा चल रही हो तो जातक को अपने कैरियर में असफलताओं का सामना करना पड़ सकता है।

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बुधः- बृहस्पति के बाद बुध ऐसा ग्रह है जो केन्द्राधिपति दोष से अधिक प्रभावित होता है जब यह पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में स्थित होता है चूंकि पहला भाव केन्द्र और त्रिकोण दोनो होता है। इसलिए यह दोष पहले भाव में नही होगा लेकिन जब बुध चौथे भाव में हो तो शिक्षा में बाधाएं आती है। यदि बुध की महादशा चल रही हो और बुध सातवें भाव में स्थित हो तो यह सम्बन्धों को प्रभावित कर सकता है। इसी प्रकार यदि बुध दसवें भाव में स्थित हो तो यह करियर में कुछ समस्याएं उत्पन्न कर सकता है।

शुक्रः- बुध के बाद शुक्र वह अलग ग्रह है जिसके बारे में कहा जाता है कि वह पहले, चौथे, सातवें और दसवें भाव में स्थिति होने पर इस दोष से प्रभावित होता है।

मेष, कर्क और वृश्चिक लग्न के लोग इस दोष से अधिक प्रभावित होते है यदि कोई व्यक्ति शुक्र की महादशा का सामना कर रहा हो और उसका लग्न मेष हो तो सातवें भाव में शुक्र की स्थिति उनके संबंधों में परेशानियां खड़ी कर सकता है। यदि वह स्वयं का व्यवसाय चला रहा है तो उसे व्यवसायिक समस्याओं से गुजरना पड़ता है।

चन्द्रमाः- चन्द्रमा इस दोष से प्रभावित होने वाला आखिरी ग्रह है। चन्द्रमा के दो मुख्य चरण होते है शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष यह दोष शुक्ल पक्ष पर लागू होता है क्योंकि शुक्ल पक्ष को लाभकारी माना जाता है। यदि किसी व्यक्ति के लिए चन्द्रमा की महादशा चल रही है और उनका लग्न मेष है तो स्वयं भाव में चन्द्रमा की स्थिति पारिवारिक समस्याओं का कारण बन सकता है।

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उपायः-

1. गुरुवार के दिन बृहस्पति ग्रह के लिए पूजा करनी चाहिए।
2. प्रतिदिन 21 बार ओम गुरुवें नमः का जाप करनी चाहिए।
3. गुरुवार के दिन व्रत रखना चाहिए।