मकर संक्रान्ति

क्या है मकर संक्रान्ति ? शुभ मुहूर्त, महत्व

जनवरी माह में सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार मकर संक्रान्ति को माना गया है। इस त्यौहार से बसंत ऋतु का आगमन होता है। इस पर्व को सर्दियों और अंधेरे के अंत के प्रतीक के रुप में जाना जाता है। संक्रान्ति के दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में गोचर करेंगे। जब सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण में आते है तो यह सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन जप, तप, ध्यान तथा धार्मिक क्रिया कलापों का अधिक महत्व होता है। कई स्थानों पर इसे फसल उत्सव के नाम से भी जाना जाता है।
मकर संक्रान्ति का त्यौहार उन त्यौहारों मे से एक है जो चन्द्र की बजाय चक्र के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन सूर्य एक माह के लिए शनि के घर में प्रवेश करता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार वर्ष 2023 की संक्रान्ति बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि 30 वर्षों के बाद यह योग बन रहा है कि दोनों ग्रह मकर राशि में उपस्थित होंगे। दो विपरीत ग्रहों का एक ही राशि में उपस्थित होना, सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है।

मकर संक्रान्ति की शुभ तिथि

मकर राशि में सूर्य का गोचर हो रहा है इसलिए यह मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2023 में मकर संक्रान्ति 15 जनवरी 2023 दिन रविवार को मनाया जायेगा। संक्रान्ति के दिन दान करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है। दान देने के लिए भी उचित समय का होना आवश्यक है।
मकर संक्रान्ति का शुभ मुहूर्त 15 जनवरी 2023 दिन रविवार
संक्रान्ति पुण्यकालः- प्रातः 07ः15 से शाम 05ः46 तक
महा पुण्यकालः- प्रातः 07ः15 से 09ः00 तक

भारत में मकर संक्रान्ति

भारत कों त्यौहारोंका देश माना जाता है। मकर संक्रान्ति का त्यौहार बहुत ही धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। लोग नए-नए वस्त्र पहनते है तथा घर के बने व्यंजनों का स्वाद लेते है जो सामान्यतः गुड़ और तिल से बने होते है। इस दिन भारत के कुछ हिस्सों मे खिचड़ी खाई जाती है। तमिलनाडु में यह त्यौहार पोंगल के रुप में मनाया जाता है। लोग बड़े उत्साह के साथ ताजे दूध और गुड़ के साथ उबले हुए चावल खाते है।

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मकर संक्रान्ति और उसका ज्योतिषीय महत्व

मकर संक्रान्ति का धार्मिक महत्व के साथ-साथ ज्योतिषीय महत्व भी है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रान्ति का त्यौहार ऋषियों और योगियों के लिए उनकी आध्यात्मिक यात्रा में एक नई पहल के लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। आमतौर पर लोग मकर संक्रान्ति को नए समय की शुरुआत और अतीत की बुरी और भयानक यादों को पीछे छोड़ देने का दिन भी मानते है। आज के शुभ दिन पर सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाता है। सूर्य की यह स्थिति अत्यंत शुभ है। धार्मिक दृष्टिकोण से यह दिन सुख और समृद्धि से जुड़ा है।

मकर संक्रान्ति के लाभ

☸ प्रत्येक वर्ष में कुल बारह संक्रान्तियाँ होती है और प्रत्येक संक्रान्ति का अपना विशेष महत्व है।
☸ यह संक्रान्ति विद्वान और शिक्षित लोगों के लिए शुभ साबित होगी।
☸ जतकों के स्वास्थ्य में सुधार देखने को मिलेगा।
☸ अंतराष्ट्रीय संबंधो मे मधुरता बढ़ेगी।
☸ अनाज के भंडारण मे उन्नति होगी।
☸ व्यापारियों एवं कारोबारियों लोगों को लाभ की प्राप्ति होगी।

मकर संक्रान्ति पर क्या करें दान

मकर संक्रान्ति के दिन सूर्यदेव धनु राशि से मकर राशि मे गोचर करेंगे इसलिए इसे मकर संक्रान्ति कहा जाता है। इस दिन दान-पुण्य का कार्य करने से शुभ लाभ की प्राप्ति होगी।
मकर संक्रान्ति के दिन किसी जरुरतमंद या गरीब व्यक्ति को तिल या उससे बनी वस्तुओं का दान करें क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस दिन शनिदेव ने अपने पिता सूर्यदेव की पूजा के लिए काले तिल का प्रयोग किया था। जिससे प्रसन्न होकर शनिदेव को सूर्य ने वरदान स्वरुप कहा था कि जो भी इस दिन तिल का दान करेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होगी तथा शनि दोषो से मुक्ति मिलेगी।
मकर संक्रान्ति के दिन कुंभ राशि, मकर राशि के जातक काले तिल का दान जरुर करें। वही मेष, तुला, सिंह और मिथुन राशि के जातक राहू के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए कम्बल दान करें। वृश्चिक धनु और मीन राशि के जातकों के लिए चावल और फल का दान करना बेहद लाभकारी होगा।

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मकर संक्रान्ति का महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान सूर्य देव अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते है। शनि मकर राशि के देवता है। इसी कारणवश मकर संक्रान्ति कहा जाता है।

कथाः-2

प्राचीन कथाओं की मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के योद्धा और कौरवों की सेना के सेनापति गंगापुत्र भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। अर्जुन के बाण लगाने के बाद उन्होने इस दिन की महत्ता को जानते हुए अपनी मृत्यु के लिए इस दिन को चुना गया।

कथाः-3

एक धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संक्रान्ति के दिन ही मां गंगा स्वर्ग से अवतरित होकर राजा भागीरथी के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई गंगासागर तक पहुंची थी। धरती पर अवतरित होने के बाद राजा भागीरथ ने गंगा के पावन जल से अपने पूर्वजों का तर्पण किया था। इस दिन पर गंगा सागर पर नदी के किनारे भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।

पोंगल

तमिलनाडु मे मनाया जाने वाला पोंगल थाई पोंगल के नाम से जाना जाता है। पोंगल का त्यौहार भगवान इन्द्र को श्रद्धांजलि देने के लिए चार दिनों के उत्सवों के रुप में मनाया जाता है। यह दिन भगवान इन्द्र को भरपूर बारिश के लिए आभार मानने का एक माध्यम है। इसलिए उपजाऊ भूमि और अच्छी उपज की कामना स्वरुप यह मनाई जाती है।

थाई पोंगल के दूसरे दिन ताजा पका हुआ चावल दूध में उबाला जाता है और इसे भगवान सूर्य के प्रसाद स्वरुप अर्पित किया जाता है, उसके बाद तीसरे दिन मंट्टू पोंगल ‘ बसवा ’ भगवान शिव के बैल को घंटियों, फूलो की माला और पेंट के साथ सजाकर पूजन किया जाता है। पोंगल के चौथे दिन, कन्नुम पोंगल मनाया जाता है। जिसमे घर की सभी महिलाएं एक साथ विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करती है।

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वैशाली

मकर संक्रान्ति को वैशाखी पर्व भी कहा जाता है। पंजाब मे यह बहुत उल्लास के साथ मनाया जाने वाला एक फसल त्यौहार है, यह वसंत ऋतु के अनुरुप पंजाबी नववर्ष को भी चिन्हित करता है। इसी दिन 3 अप्रैल 1699 को दसवें गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। सिक्ख इस त्यौहार को सामूहिक जन्मदिवस के रुप मे मनाते है।

स्नान दान, पूजन विधान

☸इस दिन नदी, सरोवर, कुंड आदि में स्नान करने तथा सूर्य को अर्घ देने का विशेष महत्व है।
☸स्नानोपरांत सूर्य सहस्त्रनाम, आदित्य हृदय स्त्रोत, सूर्य चालीसा, सूर्य मंत्र का पाठ कर सूर्य की आराधना करनी चाहिए।
☸उसके बाद गुड़, तिल, कंबल, खिचड़ी, चावल आदि पुरोहितों या गरीबों को प्रदान करना चाहिए।
☸वायु पुराण में मकर संक्रान्ति पर तांबूल दान का भी विशेष महत्व बताया गया है।